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বিজ্ঞাপন

शिव पूजा के लिए पवित्र भस्म (विभूति) तैयार करने की विधि और महत्व




शिव पूजा के लिए पवित्र भस्म (विभूति) तैयार करने की विधि और महत्व

(अपूर्व दास)

भारतीय सनातन धर्म और विशेष रूप से शैव परंपरा में 'भस्म' या 'विभूति' का स्थान अत्यंत उच्च है। देवाधिदेव महादेव को 'भस्मप्रिय' भी कहा जाता है, क्योंकि वे अपने पूरे शरीर पर शमशान की चिताभस्म रमाए रहते हैं। शिव पूजा के लिए भस्म अनिवार्य है। यह पवित्र भस्म मनुष्य की नश्वरता, संसार के प्रति अनासक्ति और आत्मशुद्धि का प्रतीक है। बाजार में मिलने वाली सुगंधित कृत्रिम भस्म की तुलना में, घर पर शास्त्रोक्त विधि से तैयार की गई भस्म शिवलिंग पर अर्पित करने से अधिक आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है।

शिव पूजा के लिए उपयोग होने वाली पवित्र भस्म तैयार करने की विधि, आवश्यक सामग्री और इसके नियम नीचे दिए गए हैं:




⚪ भस्म क्या है और इसके प्रकार

संस्कृत शब्द 'भस्म' का अर्थ है वह पदार्थ जो हमारे पापों का भक्षण करे या नाश करे (भर्त्सना)। इसे 'विभूति' भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है दिव्य ऐश्वर्य। शास्त्रों में कई प्रकार की भस्म का उल्लेख है:
 • शांतिक भस्म: यज्ञ या हवन से एकत्रित की गई भस्म।
 • पौष्टिक भस्म या कल्प भस्म: गाय के गोबर और विशेष जड़ी-बूटियों को जलाकर तैयार की गई भस्म।
 • कामद भस्म: विशेष कामना पूर्ति के लिए तंत्रोक्त पद्धति से बनाई गई भस्म।
👉 शिव पूजा के लिए आमतौर पर 'कल्प भस्म' या गोबर से बनी भस्म को सर्वाधिक पवित्र माना जाता है।

⚪ भस्म तैयार करने के लिए आवश्यक सामग्री

विशुद्ध भस्म तैयार करने के लिए आपको निम्नलिखित प्राकृतिक और पवित्र सामग्रियों की आवश्यकता होगी:
 • गाय का गोबर: केवल उस गाय का ताजा गोबर इकट्ठा करें जो केवल घास खाती हो। जर्सी या अन्य गायों की तुलना में देसी गाय (साहीवाल आदि) के गोबर में अधिक सात्विक गुण माने जाते हैं।
 • सूखी लकड़ी या समिधा: यज्ञ के लिए आम, पलाश, बरगद या पीपल के पेड़ की सूखी टहनियाँ।
• देसी गाय का घी: हवन की अग्नि प्रज्वलित करने के लिए।
• कपूर: अग्नि जलाने के लिए (भीमसेनी या पूजा वाला कपूर)।
• हवन सामग्री: तिल, जौ, चावल (अक्षत: हल्दी पानी में मिलाए गए 21 साबुत चावल), गुड़, और सुगंधित जड़ी-बूटियों का मिश्रण।
• तांबे या मिट्टी का पात्र: भस्म रखने के लिए।
• सफेद सूती कपड़ा: छानने और ढकने के लिए।

⚪ भस्म तैयार करने की विधि

भस्म तैयार करना केवल एक रासायनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक आध्यात्मिक क्रिया है। इसलिए, नीचे दी गई विधियों का भक्तिभाव से पालन करना चाहिए:

(1) गोबर संग्रह और सुखाना:
सबसे पहले पवित्र मन से गाय का गोबर इकट्ठा करें। ध्यान रखें कि गोबर जमीन पर गिरकर गंदा न हुआ हो। इस गोबर से छोटे गोलाकार या चपटे आकार के उपले (कंडे/पिठा) बनाएं। इन्हें धूप में अच्छी तरह सुखाना होगा ताकि वे पूरी तरह से आग में जल सकें। किसी भी प्रकार के सड़े हुए या फफूंद लगे गोबर का प्रयोग न करें।

(2) हवन या यज्ञ का आयोजन:
भस्म तैयार करने के लिए एक छोटा यज्ञ या हवन आयोजित करना चाहिए। घर के किसी पवित्र स्थान पर मिट्टी या ईंटों से एक छोटी वेदी या कुंड बनाएं। इसे गोबर और मिट्टी से लीप कर शुद्ध कर लें।

(3) अग्नि संयोग:
सूखे गोबर के उपलों को कुंड में सुंदर तरीके से सजाएं। उसके ऊपर थोड़ा कपूर और देसी घी डालकर अग्नि प्रज्वलित करें। अग्नि जलाते समय महादेव का नाम या मंत्र १०८ बार उच्चारित करें।

(4) मंत्र उच्चारण और आहुति:
जब अग्नि अच्छी तरह जल उठे, तब उसमें हवन सामग्री (तिल, जौ, चावल आदि) की आहुति दें। इस समय आप "ॐ नमः शिवाय" या "ॐ त्र्यम्बकं यजामहे..." (महामृत्युंजय मंत्र) का १०८ बार जाप करें। आपकी प्रत्येक आहुति के साथ भस्म की पवित्रता बढ़ती है। ध्यान रखें, आग पूरी तरह से जलनी चाहिए ताकि केवल सफेद राख शेष रहे। काला हिस्सा या आधा जला हुआ कोयला न रहे, इसके लिए आग को अच्छी तरह जलाएं।

(5) स्वाभाविक रूप से अग्नि को बुझने दें:
यज्ञ समाप्त होने के बाद अग्नि को स्वाभाविक रूप से बुझने दें। पानी डालकर नहीं बुझाना चाहिए। जब यह अपने आप ठंडी होती है, तभी इसके गुण बरकरार रहते हैं। इस प्रक्रिया में कई घंटे या पूरी रात भी लग सकती है।

(6) भस्म संग्रह और शोधन:
आग बुझने के बाद जो सफेद राख या भस्म जमा होगी, उसे बहुत सावधानी से एक साफ बर्तन में इकट्ठा करें। यह भस्म खुरदरी हो सकती है। इसलिए, एक महीन सफेद सूती कपड़ा लेकर भस्म को अच्छी तरह छान लें। कपड़े से छनकर निकली महीन पाउडर ही विशुद्ध 'भस्म' या 'विभूति' है।

⚪ उपयोग और संरक्षण के नियम
तैयार की गई इस पवित्र भस्म के उपयोग के लिए भी कुछ नियम हैं:
 
• संरक्षण: भस्म को हमेशा एक सूखे और वायुरोधी (air-tight) पात्र में रखें। तांबे, चांदी या लकड़ी की डिब्बी का उपयोग करना उत्तम है। प्लास्टिक के बर्तनों का उपयोग न करना ही बेहतर है।

• शिव पूजा: शिवरात्रि या किसी भी सोमवार को शिव पूजा करते समय इस भस्म को शिवलिंग पर त्रिपुण्ड (तीन रेखाओं) के रूप में अर्पित करें। शिवलिंग को स्नान कराने के बाद भस्म लेपन करने से महादेव प्रसन्न होते हैं।

• स्वयं के लिए: पूजा के अंत में प्रसाद स्वरूप इस भस्म को माथे, गले या भुजाओं पर लगाने से शरीर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और मन को शांति मिलती है।

⚪ भस्म का आध्यात्मिक महत्व

आप सोच सकते हैं कि इतनी मेहनत करके भस्म तैयार करने की क्या आवश्यकता है? इसका उत्तर गहरी आध्यात्मिकता में निहित है:

• अहंकार का नाश: जैसे आग में लकड़ी या गोबर जलकर राख हो जाता है, वैसे ही भस्म हमारे काम, क्रोध, लोभ और मोह को भस्म करने का संकेत देती है।
• नश्वरता का स्मरण: भस्म हमें याद दिलाती है कि एक दिन हमारा यह शरीर भी आग में जलकर राख हो जाएगा। इसलिए संसार के प्रति अत्यधिक मोह रखना अनुचित है।
• शिव का प्रसाद: चूंकि यह भस्म मंत्रों और हवन की अग्नि में पवित्र हुई है, इसलिए इसमें अग्नि देवता और रुद्र की शक्ति निहित होती है। यह एक रक्षा कवच की तरह काम करती है।

⚪ सावधानियां

भस्म तैयार करते समय निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान दें:
• गोबर किसी भी प्रकार के प्लास्टिक या अपवित्र वस्तु के संपर्क में न आए।
• आग जलाने के लिए केरोसिन या डीजल का उपयोग कभी न करें; केवल घी या खाने वाले कपूर का ही उपयोग करें।
• तैयार करते समय जूते-चप्पल उतारकर शुद्ध वस्त्र धारण करें।

इस प्रकार शुद्ध विधि और भक्तिभाव से घर पर तैयार की गई भस्म आपकी शिव पूजा को पूर्णता प्रदान करेगी। महादेव का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए यह पवित्र भस्म एक माध्यम के रूप में कार्य करेगी।