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महाशिवरात्रि: उत्सव की विधि, आध्यात्मिक महत्व और पालन करने योग्य नियम : Mahashivratri




महाशिवरात्रि: उत्सव की विधि, आध्यात्मिक महत्व और पालन करने योग्य नियम

(अपूर्व दास)

भारतीय सनातन धर्म और आध्यात्मिक परंपरा में महाशिवरात्रि एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण त्योहार है। फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को यह महान उत्सव मनाया जाता है। 'शिवरात्रि' शब्द का अर्थ है 'शिव की रात्रि'। माना जाता है कि इस विशेष रात में ब्रह्मांड की आध्यात्मिक ऊर्जा बहुत प्रबल होती है, जो मानव शरीर और मन को एक नई चेतना प्रदान करती है। असम तथा पूरे भारतवर्ष में शिव भक्त अत्यंत भक्तिभाव से देवाधिदेव महादेव की आराधना करते हैं।

नीचे महाशिवरात्रि पालन की विधि, इसकी अंतर्निहित कथा और पालन किए जाने वाले नियमों के बारे में विस्तार से लिखा गया है।



⚪ महाशिवरात्रि का पौराणिक महत्व

शिवरात्रि क्यों मनाई जाती है, इस संबंध में हमारे पुराणों में कई जनश्रुतियां या कहानियां हैं:

◽शिव-पार्वती का विवाह: सबसे प्रचलित मान्यता के अनुसार, इसी पवित्र दिन भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। इसलिए, यह दिन शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक है। भक्त इस दिन शिव-पार्वती की युगल मूर्ति की पूजा करते हैं ताकि उनके संसार में सुख और शांति बनी रहे।

◽समुद्र मंथन और नीलकंठ: एक अन्य कथा के अनुसार, देवताओं और असुरों द्वारा सागर मंथन करते समय 'कालकूट' नामक भयानक विष निकला था, जो सृष्टि का विनाश करने के लिए उद्यत था। सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष का पान कर उसे अपने कंठ (गले) में धारण कर लिया था, जिससे उनका कंठ नीला हो गया और वे 'नीलकंठ' नाम से प्रसिद्ध हुए। महादेव के इस त्याग के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए भी शिवरात्रि मनाई जाती है।

◽शिवलिंग का प्राकट्य: माना जाता है कि इसी रात भगवान शिव पहली बार लिंग रूप धारण कर ब्रह्मांड में प्रकट हुए थे। इसलिए इस रात शिवलिंग की पूजा विशेष रूप से फलदायी होती है।

⚪ महाशिवरात्रि कैसे मनाई जाती है?

शिवरात्रि के दिन सुबह से पूरी रात भक्ति का माहौल बना रहता है। पालन की विधियां नीचे दी गई हैं:

◽ब्रह्म मुहूर्त में स्नान: शिवरात्रि के दिन भक्त सूर्योदय से पहले या ब्रह्म मुहूर्त में बिस्तर त्याग देते हैं। पवित्र नदी या जलाशय में स्नान करना शुभ माना जाता है। पानी में काले तिल डालकर स्नान करने से शरीर की अशुद्धि दूर होती है, ऐसी मान्यता है। स्नान के बाद शुद्ध या नए वस्त्र धारण किए जाते हैं।

◽संकल्प ग्रहण: स्नान के बाद पूजा स्थल या मंदिर में जाकर हाथ में पानी, चावल और फूल लेकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इस समय मन में शिव का ध्यान करते हुए पूरे दिन उपवास रहकर पूजा करने की प्रतिज्ञा की जाती है।

◽ शिव मंदिर के दर्शन: दिन के समय भक्त शिव मंदिर जाकर शिवलिंग पर जल और दूध अर्पित करते हैं। असम के शिवदौल, उमानंद, महाभैरव, नगांव के शिवलिंग आकृति के महामृत्युंजय आदि मंदिरों में इस दिन अनगिनत भक्तों की भीड़ होती है। 'ओम नमः शिवाय' मंत्र के उच्चारण से वातावरण गूंजता रहता है।

◽रुद्राभिषेक: शिवरात्रि का सबसे महत्वपूर्ण अंग शिवलिंग का अभिषेक है। दूध, दही, शहद, घी और गंगाजल या पानी (पंचामृत) से शिवलिंग को स्नान कराया जाता है। माना जाता है कि शिवलिंग का अभिषेक करने से भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

⚪ चार प्रहर की पूजा विधि

शिवरात्रि का मुख्य आकर्षण पूरी रात जागना और चार प्रहर में चार बार पूजा करना है। रात को चार भागों में विभाजित किया जाता है और प्रत्येक प्रहर में अलग-अलग सामग्री से अभिषेक किया जाता है:

(1) प्रथम प्रहर (शाम 6 बजे से रात 9 बजे तक): इस समय शिवलिंग पर दूध अर्पित किया जाता है। साथ ही बेलपत्र, धतूरा, कमल का फूल और धूप-दीप जलाकर आराधना की जाती है।

(2) द्वितीय प्रहर (रात 9 बजे से 12 बजे तक): इस समय शिवलिंग पर दही अर्पित किया जाता है। इस प्रहर में भक्त धन-संपत्ति और समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं।

(3) तृतीय प्रहर (रात 12 बजे से 3 बजे तक): इस समय अवधि में घी अर्पित कर पूजा की जाती है। आध्यात्मिक शक्ति वृद्धि के लिए यह समय बहुत उत्तम है।

(4) चतुर्थ प्रहर (रात 3 बजे से सुबह 6 बजे तक): अंतिम प्रहर में शहद अर्पित किया जाता है। इस समय मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रार्थना की जाती है।

पूरी रात भक्त भजन-कीर्तन गाकर, शिव पुराण का पाठ करके या मंत्र जप करके जागते रहते हैं।


⚪ पालन करने योग्य नियम और नीतियां

महाशिवरात्रि का व्रत पालन करते समय कुछ विशेष नियम और सावधानियां बरतनी चाहिए। शास्त्र सम्मत ये नियम व्रत का फल प्राप्त करने में सहायता करते हैं।

(1) उपवास या व्रत के नियम:

◽निर्जला व्रत: बहुत से भक्त पूरे दिन पानी भी ग्रहण किए बिना (निर्जला) उपवास रखते हैं। शरीर और मन के संयम के लिए यह बहुत फलदायी है।

◽फलाहार: जो लोग निर्जला नहीं रह सकते (बुजुर्ग, रोगी या गर्भवती महिलाएं), वे फल-मूल, दूध आदि लघु आहार ग्रहण कर सकते हैं। लेकिन अन्न (चावल, रोटी), मछली-मांस, अंडे, प्याज, लहसुन, मिर्च, दाल या नमक युक्त भोजन का त्याग करना चाहिए।

◽सेंधा नमक: यदि अत्यंत आवश्यक हो, तो साधारण नमक के स्थान पर 'सेंधा नमक' (Rock Salt) का उपयोग किया जा सकता है।


(2) पूजा सामग्री के नियम:

शिव पूजा में क्या अर्पित करें और क्या न करें, इसे लेकर विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए:

◽बेलपत्र: महादेव का अत्यंत प्रिय बेलपत्र है। तीन पत्तों वाला दोषरहित बेलपत्र उल्टा करके (चिकना हिस्सा लिंग की ओर करके) अर्पित करना चाहिए।

◽धतूरा और आक के फूल: शिव को जंगली फूल जैसे धतूरा, आक (मदार) के फूल आदि अर्पित करने से वे बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं।

◽भस्म: शिव की एक और प्रिय वस्तु भस्म या विभूति है। माथे पर त्रिपुंड (तीन रेखाएं) बनाने के लिए और लिंग पर अर्पित करने के लिए भस्म का उपयोग किया जाता है।




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(3) क्या अर्पित नहीं करना चाहिए (वर्जित सामग्री):

◽केतकी का फूल: शास्त्र के अनुसार, शिव पूजा में केतकी या केवड़ा के फूल का उपयोग पूर्णतः वर्जित है। एक पौराणिक श्राप के कारण यह फूल शिव की पूजा में स्वीकार्य नहीं है।

◽हल्दी और कुमकुम: शिवलिंग को पुरुषत्व का प्रतीक माना जाता है, जबकि हल्दी, सिंदूर और कुमकुम सौंदर्य या स्त्री सुलभ प्रसाधन की सामग्री हैं। इसलिए शिवलिंग पर हल्दी-कुमकुम, सिंदूर नहीं लगाया जाता; इसके बदले भस्म का प्रयोग किया जाता है।

◽तुलसी: आमतौर पर शिव पूजा में तुलसी के पत्तों का उपयोग नहीं किया जाता है। इसके स्थान पर बेलपत्र ही अनिवार्य है।

◽नारियल का पानी: शिव को पूरा नारियल चढ़ाया जा सकता है, लेकिन नारियल के पानी से शिवलिंग का अभिषेक नहीं किया जाता है।

(4) आचरण विधि:

◽ब्रह्मचर्य पालन: शिवरात्रि के दिन ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक है। मन में कोई कुविचार, पत्नी या किसी अन्य के साथ यौन संबंध, काम भाव या हिंसा का भाव नहीं लाना चाहिए।

◽क्रोध त्याग: इस पवित्र दिन किसी के साथ तर्क-वितर्क या झगड़ा नहीं करना चाहिए। मन को शांत और धीर-स्थिर रखना चाहिए।

◽निद्रा त्याग: रात को सोना नहीं चाहिए। आध्यात्मिक शक्ति के जागरण के लिए रीढ़ की हड्डी सीधी करके बैठकर जप या ध्यान करना उत्तम है।

⚪ महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

केवल धार्मिक विश्वास ही नहीं, योग विज्ञान की दृष्टि से भी इस रात का विशेष महत्व है।

◽ऊर्जा का ऊर्ध्वगामी प्रवाह: माना जाता है कि इस रात पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध की स्थिति ऐसी होती है कि मानव शरीर में ऊर्जा का एक प्राकृतिक प्रवाह ऊपर की ओर (ऊर्ध्वमुखी) होता है। इसलिए, रात को बिना सोए और रीढ़ की हड्डी सीधी करके बैठने से यह ऊर्जा हमारे मस्तिष्क और चेतना को जागृत करने में मदद करती है।

◽अंधकार से प्रकाश की ओर: 'शिव' का अर्थ है 'मंगल' या 'कल्याण'। शिवरात्रि की अंधेरी रात हमारे मन की अज्ञानता, अहंकार और मोह रूपी अंधकार को दर्शाती है। शिव की आराधना इस अंधकार को नष्ट कर ज्ञान का प्रकाश प्रदान करती है।

🔴 शिव पूजा का फल: पूर्ण विधि-विधान से शिव पूजा करने से ग्रह दोष, शनि-राहु-केतु के दोष, जीवन के कुप्रभाव आदि दूर होते हैं। शत्रु भय, रोग, अमंगल आदि भी दूर होते हैं। जीवन में सुख-शांति और सफलता प्राप्त होती है।

महाशिवरात्रि केवल एक त्योहार नहीं है, यह आत्मशुद्धि और ईश्वर के साथ एकाकार होने का एक सुनहरा अवसर है। भक्ति, निष्ठा और सही नियमों का पालन करते हुए यह व्रत करने से मनुष्य के जीवन के पाप नष्ट होते हैं और सुख, शांति तथा समृद्धि प्राप्त होती है।अविवाहित लोग उपयुक्त जीवनसाथी और विवाहित लोग सुखी दांपत्य जीवन के लिए इस दिन शिव से प्रार्थना करते हैं।
आइए, हम सभी शुद्ध अंतःकरण से कहें— "ओम नमः शिवाय"।