गुवाहाटी के पामही में स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग स्वरूप भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग
(अपूर्व दास)
भारतवर्ष एक आध्यात्मिक देश है, जहाँ धर्म और विश्वास ने मानव जीवन को एक अलग दिशा प्रदान की है। हिंदू धर्म में भगवान शिव को देवाधिदेव महादेव माना जाता है और उनकी उपासना के लिए पूरे भारत में असंख्य मठ-मंदिर बनाए गए हैं। इन मंदिरों में 'द्वादश ज्योतिर्लिंग' का महत्व सर्वाधिक है।
पुराणों और धर्मशास्त्रों के अनुसार, भारत के विभिन्न स्थानों पर 12 ज्योतिर्लिंग हैं, जहाँ भगवान शिव स्वयं प्रकाश स्तंभ या ज्योति के रूप में प्रकट हुए थे। इन पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है 'भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग'।
हालाँकि महाराष्ट्र के पुणे के पास स्थित भीमाशंकर मंदिर को कई लोग यह ज्योतिर्लिंग मानते हैं, लेकिन शिव पुराण के श्लोकों और भौगोलिक विवरण के आधार पर असम के कामरूप जिले के पामही में स्थित भीमाशंकर धाम को ही वास्तविक ज्योतिर्लिंग मानने का एक मजबूत दावा और विश्वास स्थापित हो चुका है।
◽भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक वातावरण
असम का भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग गुवाहाटी महानगर के पास पश्चिमी छोर पर स्थित है। गुवाहाटी के गड़चुक से पामही जाने वाले रास्ते पर, प्रकृति के मनोरम वातावरण के बीच स्थित 'डाकिनी पहाड़ी' (वर्तमान पामही पहाड़ी) पर यह पवित्र मंदिर स्थित है। यह स्थान प्रसिद्ध दीपोर बील (झील) के बिल्कुल करीब है।
पहाड़ी के हरे-भरे पेड़-पौधे और झरने की कल-कल ध्वनि इस स्थान को एक अद्भुत आध्यात्मिक वातावरण प्रदान करती है। मंदिर का सबसे आकर्षक पहलू यहाँ स्थित प्राकृतिक शिवलिंग है। इस शिवलिंग के ऊपर पहाड़ी से निकलकर एक जलधारा या झरना निरंतर बहता रहता है, जो प्राकृतिक रूप से शिव का जलाभिषेक करता रहता है।
भक्तों का मानना है कि यह जल पवित्र है और इसके स्पर्श से मन की कलुषित भावनाएं नष्ट हो जाती हैं।
◽शास्त्रीय प्रमाण और 'डाकिनी' पहाड़ी का रहस्य
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की स्थिति के बारे में 'शिव पुराण' में स्पष्ट उल्लेख मिलता है। शिव पुराण के द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में कहा गया है: "डाकिन्यां भीमाशंकरम्"
अर्थात्, डाकिनी नामक स्थान पर भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग स्थित है। इस 'डाकिनी' शब्द को लेकर ही असम के भीमाशंकर का दावा मजबूत हो जाता है।
प्राचीन काल से ही असम या कामरूप तंत्र-मंत्र और शक्ति साधना की पीठ (केंद्र) के रूप में जाना जाता रहा है। कामरूप में 'डाकिनी' और 'योगिनी' की अवधारणा अत्यंत प्रबल है। असम के अलावा भारत में किसी अन्य स्थान पर 'डाकिनी' नामक जगह का भौगोलिक या ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता है। दूसरी ओर, गुवाहाटी का पामही क्षेत्र प्राचीन काल से ही स्थानीय लोगों के बीच डाकिनी पहाड़ी के रूप में जाना जाता था।
इसलिए, कई शोधकर्ताओं और धर्मगुरुओं का मत है कि शिव पुराण में उल्लेखित स्थान वास्तव में असम का यह पामही क्षेत्र ही है।
◽पौराणिक कथा: भीमासुर और शिव का युद्ध
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति के पीछे एक रोमांचक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। यह कथा रामायण और शिव पुराण से संबंधित है।
कथा के अनुसार, लंकापति रावण के भाई कुंभकर्ण की 'कर्कटी' नामक एक पत्नी थी। श्रीराम के हाथों कुंभकर्ण की मृत्यु के बाद कर्कटी ने अपने पुत्र 'भीम' (भीमासुर) को जंगल में पाला-पोसा। जब भीम युवा हुआ, तो उसे अपनी माँ से पता चला कि उसके पिता कुंभकर्ण को भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम ने मारा था। यह जानने के बाद भीम प्रतिशोध की आग में जलने लगा।
पिता की मृत्यु का बदला लेने और दुनिया को जीतने के लिए भीम ने हजारों वर्षों तक ब्रह्मा की कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उसे अतुलनीय शक्ति का वरदान दिया। यह वरदान पाकर भीम अहंकारी और अत्याचारी हो गया। उसने स्वर्ग, मर्त्य और पाताल को जीतकर चारों ओर हाहाकार मचा दिया। उसने देवताओं को भी पराजित कर दिया।
उस समय कामरूप देश के राजा 'सुदक्षिण' थे। राजा सुदक्षिण परम शिव भक्त थे। भीमासुर ने कामरूप पर आक्रमण करके राजा सुदक्षिण को हरा दिया और उन्हें जंजीरों से बांधकर कारागार में डाल दिया। लेकिन जेल के अंदर भी राजा सुदक्षिण की शिव भक्ति कम नहीं हुई। वे मिट्टी का एक शिवलिंग बनाकर निरंतर शिव की आराधना करने लगे।
यह खबर भीमासुर के कानों तक पहुंची। क्रोधित होकर भीमा जेल में पहुंचा और राजा से पूछा, "तू किसकी उपासना कर रहा है?"
राजा ने निर्भीकता से उत्तर दिया कि वह जगत के नाथ महादेव की पूजा कर रहे हैं। भीमासुर ने यह सुनकर उपहास किया और अपनी तलवार निकालकर उस पार्थिव शिवलिंग पर प्रहार करने के लिए तैयार हो गया।
ठीक उसी क्षण, एक प्रचंड गर्जना के साथ उस शिवलिंग से स्वयं महादेव प्रकट हुए। शिव ने अपने त्रिशूल और तीसरे नेत्र की अग्नि से भीमासुर को भस्म कर दिया।
भीमासुर के अत्याचार से जगत की रक्षा करने के बाद, देवताओं और राजा सुदक्षिण ने महादेव से उसी स्थान पर विराजमान होने की प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए भगवान शिव ने उस स्थान पर 'भीमाशंकर' नाम से ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थान ग्रहण किया।
माना जाता है कि युद्ध के समय शिव के शरीर से निकले पसीने से ही वहाँ स्थित नदी या जलधारा का निर्माण हुआ था (जिसे कुछ लोग भीमरथी नदी भी कहते हैं)।
◽मंदिर की संरचना और वर्तमान स्वरूप
गुवाहाटी के पामही में स्थित यह तीर्थस्थल कोई विशाल मानव निर्मित मंदिर नहीं है, बल्कि यह प्रकृति की गोद में एक गुफा जैसा स्थान है। यहाँ मूल शिवलिंग प्राकृतिक शिलाखंडों के बीच स्थित है। लिंग के ऊपर प्राकृतिक रूप से जलधारा बहती रहती है, जो भक्तों के लिए एक आश्चर्य का विषय है। मंदिर जाने के लिए पहाड़ी के ऊपर सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। रास्ते में गणेश मंदिर और अन्य देवी-देवताओं के छोटे-छोटे स्थान देखने को मिलते हैं।
वर्तमान में असम सरकार और स्थानीय मंदिर प्रबंधन समिति ने इस स्थान के विकास के लिए कई कदम उठाए हैं। भक्तों की सुविधा के लिए विश्राम गृह, पानी की व्यवस्था और यातायात की सुगम व्यवस्था की गई है।
◽धार्मिक महत्व और उत्सव
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग न केवल असम के लिए, बल्कि पूरे भारत के शिव भक्तों के लिए एक पवित्र तीर्थस्थल है। यहाँ साल भर भक्तों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन विशेष तिथियों पर भारी भीड़ देखने को मिलती है।
(1) महाशिवरात्रि: शिवरात्रि के दिन यहाँ लाखों भक्तों का तांता लगा रहता है। भक्त पूरी रात जागकर शिव की आराधना करते हैं, यज्ञ करते हैं और लंबी कतारों में खड़े होकर शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। इस दौरान मेला भी आयोजित होता है।
(2) सावन माह का 'बोल बम' (Bol Bom): पवित्र सावन महीने में गेरुआ वस्त्र धारण किए हजारों 'बोल बम' यात्री पैदल चलकर यहाँ आते हैं और पवित्र जल अर्पित करते हैं। पहाड़ी रास्ते पर भक्तों की भीड़ और "हर हर महादेव" की गूँज एक अलौकिक वातावरण का निर्माण करती है।
◽पर्यटन की संभावना
धार्मिक महत्व के अलावा, भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग क्षेत्र एक उत्कृष्ट पर्यटन स्थल भी हो सकता है। इससे सटा हुआ दीपोर बील एक अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त आर्द्रभूमि (Ramsar Site) है। पर्यटक एक साथ दीपोर बील में पक्षी निरीक्षण (Bird Watching) और भीमाशंकर की ट्रेकिंग (Trekking) या दर्शन का अनुभव ले सकते हैं। शहर के शोर-शराबे से दूर यह एक शांत और एकांत स्थान है।
◽यातायात व्यवस्था
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग जाने के लिए यातायात व्यवस्था अत्यंत सुगम है:
👉 वायु मार्ग: गुवाहाटी के बोरझार हवाई अड्डे से इसकी दूरी लगभग 20-25 किलोमीटर है।
👉 रेल मार्ग: गुवाहाटी रेलवे स्टेशन या कामाख्या जंक्शन से टैक्सी या बस द्वारा आसानी से यहाँ पहुँचा जा सकता है।
👉 सड़क मार्ग: 37 नंबर राष्ट्रीय राजमार्ग से होकर गड़चुक
चारियाली से पामही की ओर जाने वाले रास्ते पर लगभग 10-12 किलोमीटर जाने पर यह मंदिर मिलता है। गड़चुक से ऑटो या मैजिक गाड़ी की सुविधा भी उपलब्ध है।
हालाँकि महाराष्ट्र सरकार या कुछ संस्थाएँ पुणे के भीमाशंकर को द्वादश ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रचारित करती हैं, फिर भी हालिया शोध, शिव पुराण में 'डाकिनी' शब्द की भौगोलिक स्थिति और असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा की गई पहल के परिणामस्वरूप असम के भीमाशंकर का प्रचार बढ़ा है। पुरातात्विक और पौराणिक तथ्य असम के दावे को ही अधिक सशक्त बनाते हैं।
असम के पामही में स्थित भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग केवल एक मंदिर ही नहीं, बल्कि यह असम की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है। प्रकृति का अनुपम सौंदर्य और भक्ति की पवित्र धारा ने इसे एक स्वर्गीय स्थान में बदल दिया है।
कामाख्या धाम की तरह ही भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग भी असम को विश्व के आध्यात्मिक मानचित्र पर एक विशेष स्थान दिलाने में सक्षम है। सरकार और जनता के संयुक्त प्रयासों से यदि इस स्थान का संरक्षण और प्रचार हो, तो यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि आने वाले समय में यह भारत के सर्वश्रेष्ठ तीर्थस्थलों में से एक माना जाएगा। प्रत्येक असमिया को एक बार कम से कम इस पवित्र स्थान के दर्शन करके अपनी विरासत को महसूस करना चाहिए।