संकष्टी चतुर्थी व्रत एवं गणेश पूजा – महत्व, विधि और लाभ
( Apurba Das )
संकष्टी चतुर्थी हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र व्रत है, जो भगवान श्री गणेश को समर्पित होता है। “संकष्टी” शब्द का अर्थ है—कष्टों से मुक्ति। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से भगवान गणेश की पूजा करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह व्रत प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है और विशेष रूप से विवाहित महिलाएँ इसे संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली के लिए करती हैं।
◽संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व
भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य कहा जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत गणेश पूजन से ही की जाती है। शास्त्रों के अनुसार, संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश पृथ्वी पर विचरण करते हैं और अपने भक्तों के कष्ट हर लेते हैं।
यह भी मान्यता है कि चंद्रमा के दर्शन के बिना यह व्रत पूर्ण नहीं होता। चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत खोला जाता है। इस कारण इसे “चंद्रव्रत” भी कहा जाता है। इस माह की संकष्टी चतुर्थी को विशेष रूप से सकट चतुर्थी या साकट चौथ कहा जाता है, जिसका विशेष महत्व है।
◽पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय भगवान इंद्र को अपने अहंकार के कारण कष्ट भोगना पड़ा। उन्होंने संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखकर भगवान गणेश की आराधना की, जिससे उनके सभी संकट दूर हो गए। तभी से यह व्रत कष्ट निवारण का प्रतीक माना जाता है।
एक अन्य कथा के अनुसार, माता पार्वती ने संतान की रक्षा के लिए यह व्रत रखा था, जिससे यह विश्वास बना कि यह व्रत संतान सुख और रक्षा प्रदान करता है।
◽संकष्टी चतुर्थी व्रत की विधि
संकष्टी चतुर्थी का व्रत अत्यंत श्रद्धा और नियमपूर्वक किया जाता है। इसकी विधि इस प्रकार है—
1. प्रातःकाल की तैयारी
व्रती को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए। स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा स्थल की साफ-सफाई करें और भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
2. संकल्प
हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर व्रत का संकल्प करें कि आप श्रद्धा से संकष्टी चतुर्थी व्रत करेंगे और नियमों का पालन करेंगे।
3. पूजा सामग्री
दूर्वा (11 या 21), लाल फूल, सिंदूर, मोदक या लड्डू, धूप, दीप, अक्षत, जल
4. गणेश पूजा
भगवान गणेश को जल अर्पित करें, फिर सिंदूर, फूल और दूर्वा चढ़ाएँ। धूप-दीप जलाकर मोदक का भोग लगाएँ। इसके बाद गणेश मंत्र या गणेश चालीसा का पाठ करें।
मंत्र: ॐ गण गणपतये नमः (108 बार)
◽व्रत के नियम
• व्रती पूरे दिन उपवास रखता है।
• फलाहार या केवल जल ग्रहण किया जा सकता है।
• तामसिक भोजन, झूठ और क्रोध से बचना चाहिए।
• ब्रह्मचर्य और शुद्ध आचरण का पालन करना चाहिए।
◽चंद्र दर्शन और व्रत पारण
संकष्टी चतुर्थी का सबसे महत्वपूर्ण अंग चंद्र दर्शन है। संध्या या रात्रि में चंद्रमा के उदय के बाद उसे जल, अक्षत और दीप अर्पित करें। चंद्रमा को प्रणाम कर अपनी मनोकामना कहें। इसके बाद ही व्रत खोलें।
◽संकष्टी चतुर्थी व्रत के लाभ
• जीवन के सभी प्रकार के संकट दूर होते हैं
• मानसिक शांति और आत्मबल बढ़ता है
• धन, विद्या और यश की प्राप्ति होती है
• संतान की रक्षा और दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है
• नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है
संकष्टी चतुर्थी व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आस्था का प्रतीक है। भगवान गणेश की सच्चे मन से की गई पूजा व्यक्ति को धैर्य, विवेक और सफलता का मार्ग दिखाती है। यदि यह व्रत श्रद्धा और नियमों के साथ किया जाए, तो जीवन में आने वाले हर प्रकार के विघ्न स्वतः ही दूर हो जाते हैं।
“वक्रतुंड महाकाय, सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव, सर्वकार्येषु सर्वदा॥”