(अनुराधा दास)
असम के विभिन्न जनजातीय समुदायों की अपनी-अपनी संस्कृति, नृत्य, संगीत और उत्सव हैं। यह विविधता असम के सामाजिक जीवन को अत्यंत समृद्ध बनाती है। बोडो जनजाति असम की एक प्राचीन और गौरवशाली जनजाति है। उनकी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग बागुरुम्बा नृत्य और बोहाग महीने में मनाया जाने वाला बोहाग उत्सव (वैशागु) है। ये दोनों ही बोडो समाज के जीवन, विश्वास और आनंद के प्रतीक हैं।
◽ बागुरुम्बा क्या है?
बागुरुम्बा बोडो जनजाति का एक पारंपरिक लोकनृत्य है। इसे सामान्यतः “बोडो समाज का बसंत नृत्य” भी कहा जाता है। बोहाग महीने में, विशेष रूप से वैशागु उत्सव के समय, बागुरुम्बा नृत्य प्रस्तुत किया जाता है। यह नृत्य मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा किया जाता है, हालांकि कुछ अवसरों पर पुरुष भी संगीत के माध्यम से इसमें भाग लेते हैं।
बागुरुम्बा नृत्य में नृत्यांगनाएँ एक जैसी पारंपरिक वेशभूषा पहनकर अनुशासित रूप से नृत्य करती हैं। उनके हाथों और पैरों की गतियाँ अत्यंत कोमल, सरल और प्राकृतिक होती हैं। नृत्य की मुद्राओं में फूलों की लहर, पक्षियों की उड़ान और प्रकृति की सुंदरता का भाव प्रकट होता है। इस नृत्य में तेज़ गति नहीं होती, बल्कि यह शांत, मधुर और मन को मोह लेने वाली लय में किया जाता है।
◽ बागुरुम्बा नृत्य में प्रयुक्त वाद्ययंत्र
बागुरुम्बा नृत्य संगीत से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसमें निम्नलिखित प्रमुख वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है—
• खाम – बोडो समाज का पारंपरिक ढोल जैसा वाद्य
• चिफुंग – बाँस से बना बाँसुरी जैसा वाद्य
• जापश्रींग
• सेरजा
• गोंगना
इन वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनि नृत्य को और भी आकर्षक बना देती है। चिफुंग की मीठी तान बसंत के आगमन का आभास कराती है और खाम की ताल पर नृत्य की लय बनी रहती है।
◽ बागुरुम्बा नृत्य का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
बागुरुम्बा केवल एक नृत्य नहीं है, बल्कि यह बोडो समाज के सामाजिक जीवन का प्रतिबिंब है। इस नृत्य के माध्यम से बोडो जनजाति अपनी परंपरा, एकता और संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुँचाती है। त्योहारों, सामाजिक समारोहों और सरकारी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बागुरुम्बा नृत्य को विशेष स्थान प्राप्त है। इसने बोडो समाज की पहचान को असम ही नहीं, बल्कि पूरे भारत और विश्व स्तर पर प्रसिद्ध किया है।
◽ बोडो जनजाति बोहाग महीने में कौन-सा उत्सव मनाती है?
बोहाग महीना असम के सभी समुदायों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इसी महीने में नया वर्ष आरंभ होता है और बसंत ऋतु अपने पूर्ण रूप में दिखाई देती है। बोडो जनजाति बोहाग महीने में जो प्रमुख उत्सव मनाती है, उसे वैशागु (Bwisagu) कहा जाता है।
◽ वैशागु उत्सव क्या है?
वैशागु बोडो जनजाति का सबसे बड़ा और आनंदमय उत्सव है। यह सामान्यतः अप्रैल महीने के मध्य में, बोहाग महीने की शुरुआत में मनाया जाता है। वैशागु नए वर्ष के आगमन, प्रकृति के नवजागरण और कृषि जीवन की शुभ शुरुआत का उत्सव है।
‘वैशागु’ शब्द ‘वैसा’ (वर्ष) और ‘आगु’ (आरंभ) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है — नए वर्ष की शुरुआत।
◽ वैशागु उत्सव मनाने की विधि
वैशागु उत्सव सामान्यतः 3 से 7 दिनों तक मनाया जाता है। इन दिनों—
• गाँव के लोग मिलकर नृत्य और गीत प्रस्तुत करते हैं
• बागुरुम्बा नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है
• पारंपरिक बोडो गीत गाए जाते हैं
• ढोल और बाँसुरी की मधुर ध्वनि से पूरा गाँव गूंज उठता है
इस उत्सव में उम्र, अमीरी-गरीबी का कोई भेद नहीं रहता। सभी लोग मिलकर समान रूप से आनंद मनाते हैं।
◽ वैशागु उत्सव का धार्मिक पक्ष
वैशागु केवल एक सांस्कृतिक उत्सव ही नहीं, बल्कि इसका धार्मिक महत्व भी है। उत्सव के कुछ दिनों में बोडो समाज अपने पारंपरिक देवताओं की पूजा करता है, विशेष रूप से बाथौ देवता की। बाथौ को बोडो समाज का सर्वोच्च देवता माना जाता है। पूजा के माध्यम से लोग अच्छी फसल, सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।
◽ भोजन, पेय और वेशभूषा
वैशागु के अवसर पर बोडो समाज में विशेष पारंपरिक भोजन तैयार किए जाते हैं। चावल, सूअर का मांस, मछली और स्थानीय जड़ी-बूटियों से बने व्यंजन उत्सव को और भी रंगीन बनाते हैं। कुछ स्थानों पर चावल से बनी पारंपरिक पेय लाउपानी का भी सेवन किया जाता है।
वेशभूषा की बात करें तो महिलाएँ डोखना, रेंगे-रेंगे गंग जुमग्रा, अरनाई, गसला, चंद्रहाला माला, फुलकुरी खेड़ा, असम गाथा आदि पारंपरिक वस्त्र और आभूषण पहनती हैं।
बागुरुम्बा नृत्य और वैशागु उत्सव बोडो जनजाति की आत्मा से गहराई से जुड़े हुए हैं। बागुरुम्बा ने बोडो नृत्य संस्कृति को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई है, जबकि वैशागु ने उनके सामाजिक एकता, आनंद और प्रकृति से संबंध को और मजबूत किया है। ये दोनों असम की सांस्कृतिक विरासत के अमूल्य रत्न हैं। हमारा कर्तव्य है कि हम इन परंपराओं, नृत्यों और उत्सवों को संरक्षित करें और नई पीढ़ी को इनके महत्व से अवगत कराएँ, ताकि असम की बहुसांस्कृतिक परंपरा सदैव जीवित बनी रहे।






