आज है भोगाली बिहू : यह असमिया लोगों का आनंद और भोग का त्योहार है
( अपूर्व दास )
आज असम की धरती उल्लास, स्वाद और परंपराओं से महक रही है, क्योंकि आज भोगाली बिहू मनाया जा रहा है। इसे माघ बिहू भी कहा जाता है। यह त्योहार असमिया समाज का सबसे आनंदपूर्ण पर्व माना जाता है, क्योंकि इसमें मेहनत के फल का भोग किया जाता है और जीवन की समृद्धि का उत्सव मनाया जाता है। भोगाली बिहू केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि असम की सांस्कृतिक आत्मा है, जो लोगों को एक-दूसरे से जोड़ती है।
◽भोगाली बिहू का अर्थ और महत्व
“भोगाली” शब्द “भोग” से बना है, जिसका अर्थ है आनंद, भोजन और सुख। खेती-किसानी पर आधारित असमिया समाज के लिए यह त्योहार बहुत विशेष है, क्योंकि फसल कटाई के बाद अनाज घरों में भर जाता है। पूरे वर्ष की मेहनत के बाद जब अन्न की भरपूरता होती है, तब लोग ईश्वर को धन्यवाद देते हैं और जीवन के सुखों का आनंद लेते हैं। यही कारण है कि भोगाली बिहू को भोग और उत्सव का पर्व कहा जाता है।
◽माघ माह और प्रकृति का संबंध
भोगाली बिहू हर साल माघ महीने में मनाया जाता है। यह वह समय होता है जब ठंड अपने चरम पर होती है, लेकिन दिलों में गर्मजोशी और उत्साह भरा रहता है। खेतों में सुनहरी फसल कट चुकी होती है और किसान राहत की सांस लेते हैं। प्रकृति और मानव जीवन का यह मेल असमिया संस्कृति की सबसे सुंदर झलक दिखाता है।
◽उरुका: उत्सव की रात
भोगाली बिहू से एक दिन पहले की रात को उरुका कहा जाता है। यह रात असमिया लोगों के लिए सबसे खास होती है। इस दिन लोग नदी किनारे, खेतों में या खुले मैदानों में अस्थायी झोपड़ियाँ बनाते हैं, जिन्हें भेलाघर कहा जाता है। इसे 'नरा' बनाया जाता है। असमिया भाषा में “नरा” शब्द का अर्थ मुख्य रूप से धान की कटाई के बाद खेत में बचा हुआ पौधे का निचला भाग (ठूंठ/डंठल) होता है।
नरा का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में ईंधन के रूप में किया जाता है।
इसे मेजी और भेलाघर बनाने में खास तौर पर इस्तेमाल किया जाता है, विशेषकर भोगाली बिहू के समय। कई जगहों पर नरा को पशुओं के लिए चारा या खेत की मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए भी प्रयोग किया जाता है।
उरूका की रात भेलाघर में सामूहिक रूप से खाना पकाया जाता है और पूरी रात गीत-संगीत, हंसी-मजाक और आग के चारों ओर बैठकर बिताई जाती है।
उरूका की रात भोगाली बिहू की सबसे अनौपचारिक और हास्यपूर्ण रात होती है। इस रात दोस्त-यार, युवा और गांव वाले हँसी-मज़ाक में छोटी-मोटी ‘चोरी’ करते हैं, जैसे किसी के आंगन से लकड़ी, नरा या सब्ज़ी ले आना—ताकि मेजी जलाने या सामूहिक भोजन बनाने में इस्तेमाल हो सके। इसे असली चोरी नहीं माना जाता, बल्कि परंपरागत शरारत समझा जाता है। लेकिन सुबह होते ही वही लोग माफी भी मांगते हैं, रिश्तों में मधुरता बनाए रखते हैं और सब कुछ हँसते-हँसते सुलझा लिया जाता है।
उरुका की रात परिवार, मित्र और गांव के सभी लोग एक साथ आते हैं। यह सामूहिकता असमिया समाज की एकता और भाईचारे का प्रतीक है।
◽भोगाली बिहू की सुबह और मेजी दहन
भोगाली बिहू की सुबह बहुत पवित्र मानी जाती है। सुबह-सुबह लोग स्नान कर पारंपरिक वस्त्र पहनते हैं। इसके बाद मेजी नामक अग्नि जलाई जाती है, जो बांस, लकड़ी और नरा (धान के ठूंठ/डंठल) से बनाई जाती है। मेजी दहन के समय लोग अग्नि देवता को अर्पण करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। मेजी दहन केवल धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि पुराने दुखों और नकारात्मकता को जलाकर नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक है।
डोमाही के दिन (दो माह का समाहार) असमिया समाज में विशेष महत्व रखते हैं। इस दिन छोटे लोग बड़े और बुज़ुर्गों को प्रणाम करते हैं और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। बड़े-बुज़ुर्ग प्रेमपूर्वक छोटे लोगों, विशेषकर बच्चों और युवाओं को आशीर्वाद देते हैं, जो अनुशासन, सुरक्षा और अच्छे भविष्य का प्रतीक माना जाता है।
इसके बाद घर-घर से प्रेम और अपनापन झलकता है। बड़े लोग सभी को भोजन या पिठा खाने के लिए अपने घर बुलाते हैं। इस अवसर पर कोई भेदभाव नहीं होता—परिवार, रिश्तेदार, पड़ोसी और मित्र सभी एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। चारों ओर मिलजुल का वातावरण बन जाता है, जहाँ हँसी, बातचीत और अपनापन त्योहार की सुंदरता को और बढ़ा देता है।
इसके पश्चात माह की पहली तारीख, यानी एक तारीख को लोग प्रातःकाल उठकर मंदिर जाते हैं, भगवान के दर्शन करते हैं और श्रद्धा भाव से प्रार्थना करते हैं कि आने वाला समय सुखद, शांतिपूर्ण और समृद्ध रहे। लोग अपने परिवार, समाज और पूरे क्षेत्र की भलाई के लिए कामना करते हैं।
◽भोगाली बिहू के पारंपरिक व्यंजन
भोगाली बिहू का सबसे बड़ा आकर्षण है इसका भोजन। इस दिन तरह-तरह के पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। तिल से बने लड्डू, पिठा, नारियल, गुड़, चावल के व्यंजन और मांसाहारी भोजन विशेष रूप से तैयार किया जाता है।
तिल पिठा, नारिकोल पिठा, घिला पिठा और चावल से बने अनेक व्यंजन भोगाली बिहू की पहचान हैं। मछली और मांस के व्यंजन भी खास होते हैं। भोजन को केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि उत्सव का केंद्र माना जाता है।
◽खेल-कूद और मनोरंजन
भोगाली बिहू के दौरान पारंपरिक खेलों का भी आयोजन होता है। भैंस की लड़ाई, मुर्गों की लड़ाई, तीरंदाजी और अन्य ग्रामीण खेल असम की लोक संस्कृति को जीवंत करते हैं। हालांकि आधुनिक समय में पशु कल्याण को ध्यान में रखते हुए इन खेलों में बदलाव भी देखने को मिल रहा है।
◽सामाजिक एकता का पर्व
भोगाली बिहू असमिया समाज को जोड़ने वाला त्योहार है। अमीर-गरीब, जाति-धर्म का भेद भूलकर सभी लोग एक साथ खाते-पीते हैं और खुशियाँ मनाते हैं। यह पर्व सिखाता है कि सामूहिक आनंद ही जीवन की असली संपत्ति है।
◽आधुनिक समय में भोगाली बिहू
आज के समय में भोगाली बिहू शहरी क्षेत्रों में भी पूरे उत्साह से मनाया जाता है। हालांकि जीवनशैली बदल गई है, लेकिन परंपराओं का महत्व आज भी बना हुआ है। लोग सोशल मीडिया के माध्यम से शुभकामनाएँ देते हैं, लेकिन परिवार और अपनों के साथ बैठकर भोजन करने की परंपरा अब भी जीवित है।
भोगाली बिहू असमिया लोगों का भोग, परिश्रम और परंपरा का उत्सव है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि मेहनत के बाद मिलने वाला सुख ही सच्चा आनंद है। भोगाली बिहू केवल खाने-पीने का पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, समाज और संस्कृति के साथ तालमेल का प्रतीक है। आज जब पूरा असम भोगाली बिहू मना रहा है, तब हर दिल में यही भावना है—आनंद बाँटो, मिलकर जियो और जीवन का उत्सव मनाओ।
🙏 आप सभी को भोगाली बिहू की हार्दिक शुभकामनाएँ!