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বিজ্ঞাপন

पुनर्नवारिष्ट (Punarnava Arishta) : आयुर्वेदिक ग्रंथों के अनुसार विस्तृत जानकारी



पुनर्नवारिष्ट (Punarnava Arishta) : आयुर्वेदिक ग्रंथों के अनुसार विस्तृत जानकारी


( अपूर्व दास )


आयुर्वेद में पुनर्नवारिष्ट एक अत्यंत प्रसिद्ध और प्रभावशाली आसव-अरिष्ट औषधि मानी जाती है। इसका मुख्य घटक पुनर्नवा (Boerhavia diffusa) है, जिसका उल्लेख चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और भावप्रकाश निघंटु जैसे प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में मिलता है। “पुनर्नवा” शब्द का अर्थ ही है – पुनः नया करना, अर्थात शरीर की क्षीण शक्ति और विकृत धातुओं को फिर से स्वस्थ बनाना।




1. पुनर्नवारिष्ट के प्रमुख फायदे (आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से)

आयुर्वेद के अनुसार पुनर्नवारिष्ट मुख्य रूप से शोथ (सूजन), मूत्र विकार और यकृत रोगों में लाभकारी है।

(क) शोथहर (सूजन नाशक) चरक संहिता में पुनर्नवा को शोथघ्न बताया गया है। शरीर में जल संचय (एडिमा) के कारण होने वाली सूजन, पैरों की सूजन, चेहरे की सूजन आदि में पुनर्नवारिष्ट अत्यंत उपयोगी है।

(ख) मूत्रल (मूत्र बढ़ाने वाला) सुश्रुत संहिता के अनुसार पुनर्नवा मूत्रविकारों में श्रेष्ठ औषधि है। यह मूत्र की मात्रा बढ़ाकर शरीर से विषाक्त द्रवों को बाहर निकालता है।

(ग) यकृत (लिवर) के लिए लाभकारी भावप्रकाश निघंटु में पुनर्नवा को यकृतोत्तेजक कहा गया है। फैटी लिवर, पीलिया (कामला), यकृत की कमजोरी में पुनर्नवारिष्ट सहायक माना जाता है।

(घ) हृदय और रक्तसंचार में सहायक यह हृदय पर पड़े अतिरिक्त द्रवभार को कम करता है, जिससे हृदय की कार्यक्षमता बेहतर होती है।

(ङ) अग्निदीपक और पाचन सुधारक अरिष्ट होने के कारण यह पाचन अग्नि को बढ़ाता है और आम (टॉक्सिन) को नष्ट करने में मदद करता है।

2. किन-किन बीमारियों में पुनर्नवारिष्ट का उपयोग किया जाता है

आयुर्वेदिक ग्रंथों के अनुसार पुनर्नवारिष्ट का प्रयोग निम्न रोगों में किया जाता है:

शोथ रोग – शरीर में किसी भी प्रकार की सूजन
• मूत्रकृच्छ्र – पेशाब में जलन, रुक-रुक कर पेशाब आना
• अश्मरी – किडनी स्टोन (सहायक औषधि के रूप में)
• कामला (पीलिया)
• यकृत वृद्धि और फैटी लिवर
• हृद्रोग में जल संचय
• प्लीहा (तिल्ली) वृद्धि
• संधिवात में सूजन (वात-कफ जन्य शोथ)

चरक संहिता में कहा गया है कि पुनर्नवा वात-कफ शामक है और कफ से उत्पन्न भारीपन तथा जल संचय को दूर करती है।

3. पुनर्नवारिष्ट लेने की सही मात्रा और विधि

मात्रा (Dose): आयुर्वेदिक ग्रंथों एवं वैद्य प्रचलन के अनुसार –
15 से 30 मिलीलीटर, दिन में 2 बार, भोजन के बाद लेना उत्तम माना गया है।

कैसे लें: समान मात्रा में गुनगुना पानी मिलाकर सेवन करें।
सुबह और शाम भोजन के बाद लेने से अधिक लाभ होता है।

सेवन अवधि: रोग की प्रकृति के अनुसार 4 से 8 सप्ताह या वैद्य की सलाह अनुसार।

4. क्या मधुमेह (Diabetes) और लूज़ मोशन वाले लोगों को नहीं लेना चाहिए?

(क) मधुमेह (डायबिटीज) के रोगी

पुनर्नवारिष्ट एक अरिष्ट है, जो प्राकृतिक किण्वन (Fermentation) से बनता है। इस प्रक्रिया में स्वाभाविक रूप से थोड़ी मात्रा गुड़ और अल्कोहल उत्पन्न हो जाती है।
इसलिए अनियंत्रित मधुमेह के रोगियों को बिना वैद्य सलाह के इसका सेवन नहीं करना चाहिए।

(ख) लूज़ मोशन (अतिसार) वाले व्यक्ति

आयुर्वेद के अनुसार अतिसार में पाचन अग्नि मंद होती है। पुनर्नवारिष्ट अग्निदीपक और मूत्रल है, जिससे:
लूज़ मोशन की स्थिति में यह समस्या बढ़ा सकता है।
अतिसार ठीक होने के बाद ही इसका सेवन करना उचित है।

5. आयुर्वेदिक सावधानियाँ

• गर्भावस्था में बिना वैद्य सलाह सेवन न करें।
• अत्यधिक दुर्बलता या अल्कोहल संवेदनशील व्यक्तियों को सावधानी रखनी चाहिए।
• लंबे समय तक स्वयं सेवन करने के बजाय आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श आवश्यक है।


पुनर्नवारिष्ट आयुर्वेद की एक श्रेष्ठ औषधि है, जिसका वर्णन प्राचीन ग्रंथों में शोथ, मूत्र विकार और यकृत रोगों के लिए किया गया है। सही मात्रा, सही समय और उचित रोग-स्थिति में इसका सेवन शरीर के द्रव संतुलन, लिवर स्वास्थ्य और सूजन में अद्भुत लाभ देता है।
अतः पुनर्नवारिष्ट का सेवन भी वैद्य मार्गदर्शन में ही करना सर्वोत्तम माना गया है।





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