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বিজ্ঞাপন

'विलेज रॉकस्टार्स 2' के लिए बेस्ट डायरेक्टर का पुरस्कार मिला रीमा दास को । असमिया फिल्म ‘विलेज रॉकस्टार्स 2’ की कहानी




'विलेज रॉकस्टार्स 2' के लिए बेस्ट डायरेक्टर का पुरस्कार मिला रीमा दास को । असमिया फिल्म ‘विलेज रॉकस्टार्स 2’ की कहानी 

( अपूर्व दास )






असमिया फिल्म निर्माता रीमा दास, जिन्हें उनकी यथार्थवादी कहानियों और "विलेज रॉकस्टार्स" जैसी फिल्मों के लिए जाना जाता है, को हाल ही में न्यूयॉर्क विमेन इन फिल्म एंड टेलीविज़न (NYWIFT) द्वारा 'एक्सलेंस इन नरेटिव फिल्ममेकिंग' के लिए सम्मानित किया गया है, और न्यूयॉर्क इंडियन फिल्म फेस्टिवल (NYIFF) में उनकी फिल्म "विलेज रॉकस्टार्स 2" के लिए बेस्ट डायरेक्टर का पुरस्कार भी मिला है, जिससे उनकी सिनेमाई यात्रा और समावेशी वैश्विक सिनेमा के प्रति प्रतिबद्धता को पहचान मिली है।





असम की चर्चित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराही गई फिल्म विलेज रॉकस्टार्स (2017) के बाद निर्देशक रीमा दास ने उसी संवेदनशील दुनिया को आगे बढ़ाते हुए विलेज रॉकस्टार्स 2 बनाई। यह फिल्म सिर्फ एक सीक्वल नहीं है, बल्कि समय के साथ बदलते सपनों, जिम्मेदारियों और संघर्षों की एक गहरी, यथार्थवादी कहानी है। यह फिल्म ग्रामीण भारत के उस चेहरे को दिखाती है, जो अक्सर बड़े परदे पर नजरअंदाज कर दिया जाता है।


• कहानी की पृष्ठभूमि

विलेज रॉकस्टार्स 2 की कहानी असम के एक छोटे से गांव में रहने वाली लड़की धुनू के इर्द-गिर्द घूमती है। पहली फिल्म में धुनू एक नन्ही-सी लड़की थी, जिसके दिल में संगीत और गिटार बजाने का सपना पल रहा था। उसने अपने दोस्तों के साथ मिलकर “विलेज रॉकस्टार्स” नाम का एक बैंड बनाया था। उस फिल्म में बचपन की मासूमियत, गरीबी के बीच पनपते सपने और प्रकृति से जुड़ा जीवन देखने को मिला था।

दूसरी फिल्म में समय आगे बढ़ चुका है। धुनू अब किशोरावस्था में कदम रख चुकी है। सपने अब भी हैं, लेकिन जिंदगी पहले से ज्यादा कठिन हो गई है। बचपन का खेल-खिलौना अब जिम्मेदारियों में बदल चुका है।







• धुनू का संघर्ष

धुनू के परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। उसकी मां खेतों में काम करती है और घर चलाने के लिए कड़ी मेहनत करती है। धुनू भी अब मां के काम में हाथ बंटाती है। खेतों में काम, घर की जिम्मेदारियां और समाज की अपेक्षाएं – इन सबके बीच उसका संगीत कहीं दबता हुआ नजर आता है।

पहली फिल्म में जहां संगीत आज़ादी और खुशी का प्रतीक था, वहीं विलेज रॉकस्टार्स 2 में वही संगीत धुनू के लिए एक सवाल बन जाता है –

क्या सपनों के लिए लड़ना सही है, जब पेट भरने की चिंता सामने खड़ी हो?

धुनू गिटार बजाना चाहती है, लेकिन हालात उसे बार-बार याद दिलाते हैं कि जिंदगी सिर्फ सपनों से नहीं चलती। यह द्वंद्व फिल्म की आत्मा है।

• गांव और प्रकृति का बदलता रूप

फिल्म में असम के गांवों की खूबसूरत लेकिन कठोर सच्चाई दिखाई गई है। बारिश, बाढ़, सूखे खेत और कच्चे घर – ये सब सिर्फ दृश्य नहीं हैं, बल्कि कहानी का अहम हिस्सा हैं। प्रकृति यहां दोस्त भी है और दुश्मन भी।

रीमा दास ने बहुत सादगी से दिखाया है कि कैसे जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाएं ग्रामीण जीवन को प्रभावित करती हैं। धुनू का परिवार भी इन बदलावों से जूझ रहा है। जब घर में खाने की कमी होती है, तब संगीत एक “लग्ज़री” जैसा लगने लगता है।

• दोस्ती और अकेलापन

पहली फिल्म में धुनू के दोस्त उसकी ताकत थे। दूसरी फिल्म में वही दोस्त अलग-अलग रास्तों पर जाते नजर आते हैं। कोई काम की तलाश में गांव छोड़ देता है, कोई जिम्मेदारियों में उलझ जाता है।
धुनू धीरे-धीरे अकेली पड़ने लगती है।

यह अकेलापन बहुत गहराई से दिखाया गया है – बिना ज्यादा संवादों के, सिर्फ धुनू के चेहरे, उसकी चुप्पी और उसकी आंखों से। फिल्म बताती है कि बड़े होने की सबसे बड़ी कीमत कभी-कभी अकेलापन होती है।

• मां-बेटी का रिश्ता

विलेज रॉकस्टार्स 2 का सबसे मजबूत पहलू धुनू और उसकी मां का रिश्ता है। मां सख्त जरूर है, लेकिन बेरहम नहीं। वह जानती है कि सपने जरूरी हैं, पर पेट की भूख उनसे ज्यादा जरूरी लगती है।

मां चाहती है कि धुनू सुरक्षित रहे, मेहनत करे और जीवन की सच्चाई को समझे। वहीं धुनू अपने संगीत के जरिए खुद को जिंदा महसूस करती है। यह टकराव कहीं भी ऊंचे स्वर में नहीं जाता, लेकिन भीतर ही भीतर बहुत कुछ तोड़ देता है।

• फिल्म की खासियत

इस फिल्म में न तो बड़े सितारे हैं, न भारी-भरकम संवाद, न ही नाटकीय मोड़। इसकी ताकत है – सच्चाई।
रीमा दास ने गैर-पेशेवर कलाकारों के साथ काम किया है, जिससे हर दृश्य असली लगता है। कैमरा गांव के जीवन को ऐसे पकड़ता है जैसे दर्शक खुद वहां मौजूद हो।

संगीत बहुत सीमित है, लेकिन जब भी आता है, सीधे दिल को छूता है। धुनू का गिटार सिर्फ एक वाद्य नहीं, बल्कि उसकी आवाज़ है – वह आवाज़, जिसे समाज अक्सर सुनना नहीं चाहता।

◽संदेश

विलेज रॉकस्टार्स 2 यह सवाल छोड़ती है कि – क्या हर सपना पूरा होना जरूरी है? या फिर कुछ सपने सिर्फ हमें जिंदा रखने के लिए होते हैं, पूरे होने के लिए नहीं?

फिल्म किसी आसान जवाब पर खत्म नहीं होती। यह दर्शक को सोचने पर मजबूर करती है। धुनू की कहानी सिर्फ उसकी नहीं है, बल्कि उन लाखों ग्रामीण बच्चों की है, जो सपने तो देखते हैं, लेकिन हालात के बोझ तले दब जाते हैं।


विलेज रॉकस्टार्स 2 एक शांत, धीमी और भावनात्मक फिल्म है। यह मनोरंजन से ज्यादा अनुभव है। अगर आपको यथार्थ सिनेमा, ग्रामीण जीवन और इंसानी भावनाओं की सच्ची कहानियां पसंद हैं, तो यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए।

यह फिल्म शोर नहीं मचाती, बल्कि चुपचाप दिल में उतर जाती है – ठीक वैसे ही, जैसे धुनू का संगीत।




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