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Devdas 2

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 देवदास 2: 

पारो के दरवाजे पर जब देवदास ने अपनी आखिरी सांस ली, तो दुनिया को लगा कि एक अमर प्रेम कहानी का दुखद अंत हो गया है। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। देवदास की कहानी जहाँ खत्म हुई थी, देवदास 2 की कहानी वहीं से एक नया मोड़ लेती है। यह कहानी मृत्यु की नहीं, बल्कि पुनर्जन्म, पश्चाताप और एक ऐसे प्रेम की है जो समय और दर्द की सीमाओं को पार कर जाता है।

वह अमावस्या की रात थी। पारो के ससुराल के बाहर भारी बारिश हो रही थी। देवदास बेहोश पड़ा था, उसकी नब्ज लगभग रुक चुकी थी। पारो की चीखें बंद दरवाजों के पीछे घुट कर रह गई थीं। लेकिन तभी, अंधेरे में एक परछाई उभरी। वह चंद्रमुखी थी। अपने सच्चे प्यार को यूं मरने के लिए वह नहीं छोड़ सकती थी। चंद्रमुखी ने अपने सारे जेवर बेच दिए थे और देवदास को ढूंढते हुए वहां पहुंची थी। उसने स्थानीय ग्रामीणों की मदद से देवदास के ठंडे पड़े शरीर को उठाया और एक बैलगाड़ी में डालकर कलकत्ता से दूर एक छोटे से गांव, शिवपुर ले गई।

महीनों तक देवदास मौत के मुंह में रहा। चंद्रमुखी ने दिन-रात एक करके उसकी सेवा की। उसने नर्तकी का जीवन हमेशा के लिए त्याग दिया और शिवपुर में एक साधारण सेविका बनकर रहने लगी। देवदास के शरीर से शराब का जहर धीरे-धीरे कम हो रहा था, लेकिन उसकी आत्मा अब भी पारो के ख्यालों में कैद थी। जब देवदास को होश आया, तो उसने खुद को एक अजनबी जगह पर पाया। सामने चंद्रमुखी को सादे सूती कपड़ों में देखकर वह हैरान रह गया। चंद्रमुखी ने उसे बताया कि दुनिया की नजरों में देवदास मर चुका है। पारो भी यही मानती है।

यह सुनकर देवदास टूट गया, लेकिन फिर उसे एहसास हुआ कि शायद यही ईश्वर की इच्छा है। अगर पारो को पता चला कि वह जीवित है, तो उसका जीवन फिर से उथल-पुथल हो जाएगा। देवदास ने फैसला किया कि वह अपने पुराने अस्तित्व को मिटा देगा। उसने अपना नाम बदलकर 'देव' रख लिया और एक नई जिंदगी शुरू करने का संकल्प लिया। उसने शराब को कभी हाथ न लगाने की कसम खाई, क्योंकि इसी शराब ने उससे उसका सब कुछ छीन लिया था।
पाँच साल बीत गए। देव अब एक बदला हुआ इंसान था। उसने शिवपुर में बच्चों के लिए एक छोटा सा स्कूल खोल लिया था। वह गांव वालों की मदद करता और एक शांत जीवन जीता। चंद्रमुखी अब उसकी सबसे अच्छी दोस्त और मार्गदर्शक थी, हालांकि उसने कभी देव से अपने प्यार का इजहार दोबारा नहीं किया। वह बस उसे खुश और जीवित देखकर संतुष्ट थी।

दूसरी ओर, पारो का जीवन एक सुनहरी जेल बन गया था। उसके पति जमींदार भुवन चौधरी का निधन हो चुका था, और अब पूरे परिवार और एस्टेट की जिम्मेदारी पारो के कंधों पर थी। वह एक सख्त, न्यायप्रिय और दयालु महिला बन गई थी। उसने देवदास की याद में एक धर्मार्थ अस्पताल बनवाया था, जहाँ गरीबों का मुफ्त इलाज होता था। वह हर रात उस दरवाजे के पास जाकर रोती थी, जहाँ उसे लगा था कि देवदास ने दम तोड़ा है।

कहानी में मोड़ तब आता है जब बंगाल में एक भयंकर महामारी फैलती है। शिवपुर गांव भी इसकी चपेट में आ जाता है। देव और चंद्रमुखी दिन-रात बीमारों की सेवा करते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी के कारण लोग मरने लगते हैं। देव को पता चलता है कि पास के शहर में जमींदारनी पार्वती देवी का एक बड़ा धर्मार्थ अस्पताल है, जहाँ दवाइयां और डॉक्टर उपलब्ध हैं। अपने गांव को बचाने के लिए, देव मदद मांगने के लिए शहर जाने का फैसला करता है। चंद्रमुखी उसे रोकती नहीं है, क्योंकि वह जानती है कि भाग्य अपना खेल खेल रहा है।

देव जब पारो की हवेली पहुंचता है, तो वह खुद को एक साधारण शिक्षक बताता है। वह अपना चेहरा शॉल से ढके रखता है। पारो के सामने जब वह खड़ा होता है, तो हवा का एक झोंका आता है और पारो को एक जानी-पहचानी खुशबू महसूस होती है। देव बिना नजरें मिलाए शिवपुर के हालात बताता है और मदद मांगता है। पारो तुरंत दवाइयां और डॉक्टरों की एक टीम शिवपुर भेजने का आदेश देती है।
जब देव जाने लगता है, तो पारो उसे रोकती है। "तुम्हारा नाम क्या है, मास्टर मोशाय?" पारो पूछती है।

देव की आवाज कांप जाती है। "देव... देवनाथ," वह झूठ बोलता है और तेजी से बाहर निकल जाता है। लेकिन पारो का दिल जोर से धड़कने लगता है। वह आवाज, वह चलने का अंदाज... पारो को यकीन नहीं होता, लेकिन उसकी अंतरात्मा कहती है कि वह देवदास था।

अगले दिन, पारो खुद डॉक्टरों के साथ शिवपुर पहुंचती है। वहां वह देखती है कि वही शिक्षक एक बच्चे को सीने से लगाए उसे दवा पिला रहा है। पारो धीरे-धीरे उसके पास जाती है। शॉल अब देव के चेहरे पर नहीं था। सालों की तपस्या और शांति ने उसके चेहरे को बदल दिया था, लेकिन पारो की आंखें अपने देवदास को पहचानने में एक पल भी नहीं लगातीं।

"देव..." पारो के मुंह से एक धीमी सी आवाज निकलती है।
देव पलटता है। पारो को देखकर उसके हाथ से दवा की शीशी गिर जाती है। दोनों एक-दूसरे को अवाक देखते रह जाते हैं। समय जैसे रुक जाता है।

पारो रोते हुए उसके पास आती है और पूछती है कि उसने इतने सालों तक यह सच क्यों छुपाया। देव नम आंखों से कहता है, "क्योंकि मैं तुम्हें और दर्द नहीं देना चाहता था, पारो। पुराना देवदास उसी रात मर गया था। यह जो तुम्हारे सामने खड़ा है, वह सिर्फ एक इंसान है जो अपने गुनाहों की माफी मांग रहा है।"

तभी वहां चंद्रमुखी आती है। पारो चंद्रमुखी को देखकर सब समझ जाती है। पारो चंद्रमुखी के सामने हाथ जोड़कर कहती है, "तुमने मेरे देव को जीवन दिया है, तुम्हारा कर्ज मैं सात जन्मों तक नहीं चुका सकती।"

देवदास 2 का अंत किसी त्रासदी में नहीं होता। पारो वापस अपनी हवेली नहीं जाती। वह अपनी सारी संपत्ति और जिम्मेदारी अपने सौतेले बच्चों को सौंप देती है और शिवपुर में ही रह जाती है। देव, पारो और चंद्रमुखी—तीनों मिलकर उस गांव में एक बड़ा अस्पताल और स्कूल चलाते हैं। समाज उन्हें क्या कहता है, इसकी उन्हें परवाह नहीं होती। देवदास को उसका प्यार मिल गया था, पारो को उसका जीवन, और चंद्रमुखी को उसका परिवार। यह एक ऐसी कहानी बन जाती है जहाँ प्यार किसी को बर्बाद नहीं करता, बल्कि दुनिया को संवारने की ताकत बन जाता है।


📌 Devdas 2: 

When Devdas breathed his last outside Paro's gates, the world thought a tragic, immortal love story had come to an end. But destiny had other plans. Where the epic tale of Devdas ended, the story of Devdas 2 takes a new turn. This is not a story of death, but of rebirth, redemption, and a love that transcends the boundaries of time and pain.

It was a moonless night. Heavy rain lashed outside Paro's marital home. Devdas lay unconscious, his pulse almost fading. Paro's screams were stifled behind the heavy, closed wooden doors. But just then, a shadow emerged in the darkness. It was Chandramukhi. She could not leave her true love to die alone in the mud. Chandramukhi had sold all her jewelry and traveled far to find Devdas. With the help of some local villagers, she lifted Devdas's cold body, placed him in a bullock cart, and took him far away from Calcutta to a small, obscure village named Shivpur.

For months, Devdas hovered between life and death. Chandramukhi worked day and night to nurse him back to health. She gave up her life as a courtesan forever and began living as a simple caretaker in Shivpur. The poison of alcohol was slowly leaving Devdas's body, but his soul was still imprisoned in the memories of Paro. When Devdas finally regained consciousness, he found himself in a strange place. Seeing Chandramukhi in simple cotton clothes in front of him left him bewildered. She gently broke the news that in the eyes of the world, Devdas was dead. Paro, too, believed the same.

Hearing this, Devdas was shattered, but slowly, an epiphany washed over him. Perhaps this was God's will. If Paro knew he was alive, her life would be thrown into chaos once again. Devdas decided to erase his old existence completely. He changed his name to 'Dev' and resolved to start a new life. He swore never to touch a drop of alcohol again, for it was the very poison that had stripped him of everything he held dear.
Five years passed. Dev was now a changed man. He had opened a small school for the impoverished children in Shivpur. He helped the villagers and lived a quiet, peaceful life. Chandramukhi was now his best friend and guiding light, though she never confessed her love to Dev again. She was simply content seeing him alive, healthy, and finding purpose.
On the other hand, Paro's life had become a golden cage. Her husband, Zamindar Bhuvan Chaudhry, had passed away, and the entire responsibility of the estate and the family now rested on Paro's shoulders. She had evolved into a strict, just, and compassionate woman. In memory of Devdas, she had built a charitable hospital where the poor received free medical treatment. Yet, every night, she would walk to the very gates where she believed Devdas had taken his last breath, and weep silently into the darkness.

The turning point in the story arrives when a fierce epidemic breaks out in Bengal. The village of Shivpur is hit hard. Dev and Chandramukhi serve the sick day and night, but due to a severe lack of resources and medicines, people begin to succumb. Dev learns that the nearby town has a large charitable hospital run by Zamindarni Parvati Devi, equipped with medicines and expert doctors. To save his village, Dev decides to travel to the town to seek help. Chandramukhi does not stop him; she knows that destiny is finally playing its hand.

When Dev reaches Paro's grand mansion, he introduces himself as a humble village teacher. He keeps his face partially covered with a shawl. As he stands before Paro, a sudden breeze sweeps through the courtyard, bringing with it a familiar scent that startles Paro. Without meeting her gaze, Dev explains the dire situation in Shivpur and begs for assistance. Paro immediately orders a team of doctors and a massive supply of medicines to be dispatched to Shivpur.

As Dev turns to leave, Paro stops him. "What is your name, Master Moshai?" she asks, her voice trembling slightly.

Dev's voice falters. "Dev... Devnath," he lies, and quickly walks out. But Paro's heart begins to pound uncontrollably. That voice, that familiar gait... Paro cannot believe it, but her inner voice screams that it was her Devdas.
The very next day, unable to shake the feeling, Paro personally travels to Shivpur with the medical team. There, she spots the same teacher holding a sick child against his chest, gently feeding him medicine. Paro slowly walks up to him. The shawl is no longer covering Dev's face. Years of penance and inner peace had softened his features, but Paro's eyes do not take even a fraction of a second to recognize her Devdas.
"Dev..." a soft, breathy whisper escapes Paro's lips.
Dev turns around. Seeing Paro standing there, the medicine vial slips from his hands and shatters on the floor. Both stand paralyzed, staring at each other. Time seems to stand completely still.

Tears streaming down her face, Paro rushes to him and asks why he hid the truth for so many agonizing years. Dev, with misty eyes, replies, "Because I didn't want to cause you any more pain, Paro. The old Devdas died that rainy night outside your gates. The man standing before you is just a human being seeking forgiveness for his sins, trying to mend the world he once broke."
Just then, Chandramukhi walks in. Seeing her, Paro understands the unspoken truth of the past five years. Paro walks up to Chandramukhi, folds her hands in deep reverence, and says, "You gave my Dev his life back. I cannot repay your debt even in seven lifetimes."

Devdas 2 does not end in tragedy. Paro refuses to return to the lonely halls of her mansion. She hands over all her wealth and responsibilities to her stepchildren and decides to stay in Shivpur. Dev, Paro, and Chandramukhi—the three of them unite to build a massive hospital and a proper school in the village. They no longer care about what society whispers behind their backs. Devdas finally found his peace, Paro found her life, and Chandramukhi found her family. It becomes a legendary tale where love does not destroy someone, but instead becomes the ultimate power to heal and nurture the world.


📌 দেৱদাস ২: 

পাৰোৰ পদূলি মুখত যেতিয়া দেৱদাসে শেষ নিশ্বাস ত্যাগ কৰিছিল, তেতিয়া সমগ্ৰ পৃথিৱীয়ে ভাবিছিল যে এখন অমৰ প্ৰেম কাহিনীৰ এক কৰুণ অন্ত পৰিল। কিন্তু নিয়তিৰ ইচ্ছা বেলেগ আছিল। দেৱদাসৰ কাহিনী য'ত শেষ হৈছিল, তাৰ পৰাই দেৱদাস ২-ৰ কাহিনীয়ে এক নতুন মোৰ লয়। এই কাহিনী মৃত্যুৰ নহয়, বৰঞ্চ পুনৰ্জন্ম, অনুশোচনা আৰু এনে এক প্ৰেমৰ যিয়ে সময় আৰু যন্ত্ৰণাৰ সকলো সীমা অতিক্ৰম কৰে।

সেইয়া আছিল এক অমাৱস্যাৰ নিশা। পাৰোৰ শহুৰেকৰ ঘৰৰ বাহিৰত প্ৰৱল বৰষুণ হৈ আছিল। দেৱদাস অচেতন হৈ পৰি আছিল, তেওঁৰ নাড়ীৰ স্পন্দন প্ৰায় বন্ধ হৈ গৈছিল। পাৰোৰ চিঞৰবোৰ বন্ধ দুৱাৰৰ সিপাৰেই আৱদ্ধ হৈ ৰৈছিল। কিন্তু ঠিক সেই সময়তে, অন্ধকাৰৰ মাজৰ পৰা এটি ছাঁ ওলাই আহিল। সেয়া আছিল চন্দ্ৰমুখী। নিজৰ প্ৰকৃত প্ৰেমক এনেদৰে বোকাত মৰিবলৈ তাই এৰি যাব নোৱাৰিলে।
 
চন্দ্ৰমুখীয়ে তাইৰ সকলো আ-অলংকাৰ বিক্ৰী কৰি দেৱদাসক বিচাৰি সেইখিনি পাইছিলগৈ। স্থানীয় কেইজনমান গাঁৱলীয়া লোকৰ সহায়ত তাই দেৱদাসৰ চেঁচা পৰি যোৱা শৰীৰটো দাঙি এখন গৰু গাড়ীত তুলি কলিকতাৰ পৰা বহু দূৰৰ এখন সৰু গাঁও, শিৱপুৰলৈ লৈ গৈছিল।
কেইবামাহো ধৰি দেৱদাস মৃত্যুৰ সৈতে যুঁজি আছিল।

 চন্দ্ৰমুখীয়ে দিন-ৰাতি একাকাৰ কৰি তেওঁৰ সেৱা-শুশ্ৰূষা কৰিলে। তাই নৰ্তকীৰ জীৱন চিৰদিনৰ বাবে ত্যাগ কৰি শিৱপুৰত এগৰাকী সাধাৰণ সেৱিকা হিচাপে থাকিবলৈ ল'লে। মদৰ বিহ লাহে লাহে দেৱদাসৰ শৰীৰৰ পৰা আঁতৰি গৈছিল যদিও তেওঁৰ আত্মা তেতিয়াও পাৰোৰ স্মৃতিত বন্দী হৈ আছিল। যেতিয়া দেৱদাসৰ জ্ঞান ঘূৰি আহিল, তেওঁ নিজকে এখন অচিনাকি ঠাইত আৱিষ্কাৰ কৰিলে। সন্মুখত চন্দ্ৰমুখীক সাধাৰণ কপাহী কাপোৰত দেখি তেওঁ আচৰিত হৈ পৰিল। চন্দ্ৰমুখীয়ে লাহেকৈ ক'লে যে পৃথিৱীৰ চকুত দেৱদাসৰ মৃত্যু হৈছে। পাৰোৱেও সেইটোৱেই বিশ্বাস কৰে।
এই কথা শুনি দেৱদাস ভাঙি পৰিল, কিন্তু লাহে লাহে তেওঁ উপলব্ধি কৰিলে যে হয়তো এয়াই ভগৱানৰ ইচ্ছা। যদি পাৰোৱে গম পায় যে তেওঁ জীয়াই আছে, তেন্তে পাৰোৰ জীৱন পুনৰ বিশৃংখল হৈ পৰিব। দেৱদাসে সিদ্ধান্ত ল'লে যে তেওঁ নিজৰ পুৰণি অস্তিত্ব একেবাৰে মচি পেলাব। তেওঁ নিজৰ নাম সলনি কৰি 'দেৱ' ৰাখিলে আৰু এক নতুন জীৱন আৰম্ভ কৰাৰ সংকল্প ল'লে। তেওঁ প্ৰতিজ্ঞা কৰিলে যে তেওঁ কেতিয়াও মদৰ টোপাল এটাও স্পৰ্শ নকৰে, কাৰণ এই মদেই তেওঁৰ পৰা সকলো কাঢ়ি নিছিল।

পাঁচ বছৰ পাৰ হৈ গ'ল। দেৱ এতিয়া এজন সম্পূৰ্ণ সলনি হোৱা মানুহ। তেওঁ শিৱপুৰত দৰিদ্ৰ শিশুসকলৰ বাবে এখন সৰু বিদ্যালয় খুলিছিল। তেওঁ গাঁৱৰ মানুহক সহায় কৰিছিল আৰু এক শান্তিপূৰ্ণ জীৱন যাপন কৰিছিল। চন্দ্ৰমুখী এতিয়া তেওঁৰ আটাইতকৈ ভাল বন্ধু আৰু পথপ্ৰদৰ্শক আছিল, অৱশ্যে তাই কেতিয়াও দেৱৰ আগত নিজৰ প্ৰেমৰ কথা পুনৰ প্ৰকাশ কৰা নাছিল। তাই মাথোঁ দেৱক জীয়াই থকা আৰু সুস্থ দেখা পায়েই সুখী আছিল।

আনহাতে, পাৰোৰ জীৱন এক সোণোৱালী সজাত পৰিণত হৈছিল। তাইৰ স্বামী জমিদাৰ ভুৱন চৌধুৰীৰ মৃত্যু হৈছিল, আৰু এতিয়া সমগ্ৰ জমিদাৰী আৰু পৰিয়ালৰ দায়িত্ব পাৰোৰ কান্ধত পৰিছিল। তাই এগৰাকী কঠোৰ, ন্যায়পৰায়ণ আৰু দয়ালু মহিলা হিচাপে পৰিচিত হৈছিল। দেৱদাসৰ স্মৃতিত তাই এখন দাতব্য চিকিৎসালয় নিৰ্মাণ কৰিছিল, য'ত দুখীয়া লোকসকলক বিনামূলীয়াকৈ চিকিৎসা প্ৰদান কৰা হৈছিল। তথাপিও, প্ৰতি নিশাই তাই সেই দুৱাৰখনৰ ওচৰলৈ গৈ নীৰৱে উচুপিছিল, য'ত তাই বিশ্বাস কৰিছিল যে দেৱদাসে শেষ নিশ্বাস ত্যাগ কৰিছিল।

কাহিনীৰ পাক তেতিয়া ঘূৰে যেতিয়া বংগত এক ভয়ংকৰ মহামাৰী বিয়পি পৰে। শিৱপুৰ গাঁৱতো ইয়াৰ প্ৰভাৱ বেয়াকৈ পৰে। দেৱ আৰু চন্দ্ৰমুখীয়ে দিন-ৰাতি ৰোগীসকলৰ সেৱা কৰে, কিন্তু ঔষধ আৰু উপযুক্ত সুবিধাৰ অভাৱত মানুহ মৰিবলৈ ধৰে। দেৱে গম পায় যে ওচৰৰ চহৰখনত জমিদাৰনী পাৰ্বতী দেৱীৰ এখন ডাঙৰ দাতব্য চিকিৎসালয় আছে, য'ত ঔষধ আৰু অভিজ্ঞ চিকিৎসক উপলব্ধ। নিজৰ গাঁওখন বচাবলৈ দেৱে চহৰলৈ গৈ সহায় বিচৰাৰ সিদ্ধান্ত লয়। চন্দ্ৰমুখীয়ে তেওঁক বাধা নিদিয়ে; কাৰণ তাই জানে যে নিয়তিয়ে অৱশেষত নিজৰ খেল খেলিছে।

যেতিয়া দেৱ পাৰোৰ বিশাল হাভেলীত উপস্থিত হয়, তেওঁ নিজকে এজন সাধাৰণ গাঁৱলীয়া শিক্ষক হিচাপে চিনাকি দিয়ে। তেওঁ এখন চাদৰেৰে নিজৰ মুখখন আংশিকভাৱে ঢাকি ৰাখে। যেতিয়া তেওঁ পাৰোৰ সন্মুখত থিয় হয়, হঠাতে এছাটি বতাহ বলি আহে আৰু পাৰোৱে এক চিনাকি সুবাস অনুভৱ কৰি উচপ খাই উঠে। পাৰোৰ চকুলৈ নোচোৱাকৈয়ে দেৱে শিৱপুৰৰ ভয়ানক পৰিস্থিতিৰ কথা বৰ্ণনা কৰে আৰু সহায় ভিক্ষা কৰে। পাৰোৱে লগে লগে চিকিৎসকৰ এটা দল আৰু প্ৰচুৰ পৰিমাণৰ ঔষধ শিৱপুৰলৈ পঠিওৱাৰ নিৰ্দেশ দিয়ে।
যোৱাৰ সময়ত পাৰোৱে দেৱক ৰখায়। "আপোনাৰ নাম কি, মাষ্টৰ মোশাই?" তাইৰ মাতটো সামান্য কঁপি উঠে।
দেৱৰ কণ্ঠস্বৰ থোকাথুকি হৈ পৰে। "দেৱ... দেৱনাথ," তেওঁ মিছা মাতে আৰু খৰখেদাকৈ ওলাই যায়। কিন্তু পাৰোৰ বুকুখন জোৰেৰে কঁপিবলৈ ধৰে। সেই মাত, সেই খোজ কঢ়াৰ ধৰণ... পাৰোৱে বিশ্বাস কৰিব নোৱাৰে, কিন্তু তাইৰ অন্তৰাত্মাই চিঞৰি চিঞৰি কয় যে সেয়া তাইৰ দেৱদাসেই আছিল।

পিছদিনাই, মনৰ সন্দেহ দূৰ কৰিব নোৱাৰি পাৰো নিজে চিকিৎসকৰ দলটোৰ সৈতে শিৱপুৰলৈ যায়। তাত তাই দেখে যে সেই একেজন শিক্ষকেই এটা অসুস্থ শিশুক বুকুত সাৱটি ধৰি মৰমেৰে ঔষধ খুৱাই আছে। পাৰো লাহে লাহে তেওঁৰ ওচৰলৈ আগবাঢ়ি যায়। চাদৰখনে এতিয়া দেৱৰ মুখখন ঢাকি ৰখা নাছিল। বছৰ বছৰ ধৰি কৰা ত্যাগ আৰু শান্তিয়ে তেওঁৰ চেহেৰাত পৰিৱৰ্তন আনিছিল, কিন্তু পাৰোৰ চকুহাল নিজৰ দেৱদাসক চিনি পাওঁতে এক ছেকেণ্ড নালাগিল।

"দেৱ..." পাৰোৰ ওঁঠৰ পৰা এক অস্ফুট ফিচিফিচনি ওলাই আহে।
দেৱে ঘূৰি চায়। পাৰোক তাত থিয় হৈ থকা দেখি তেওঁৰ হাতৰ পৰা ঔষধৰ বটলটো সৰি মাটিত পৰে। দুয়ো শিল পৰা কপৌৰ দৰে ইজনে সিজনলৈ চাই ৰয়। সময় যেন একেবাৰে স্তব্ধ হৈ পৰে।

দুনয়নৰ চকুলোৰে পাৰো তেওঁৰ কাষলৈ দৌৰি আহে আৰু সোধে কিয় তেওঁ ইমান বছৰে এই সত্য লুকুৱাই ৰাখিছিল। দেৱে চলচলীয়া চকুৰে উত্তৰ দিয়ে, "কাৰণ মই তোমাক আৰু কষ্ট দিব বিচৰা নাছিলো, পাৰো। পুৰণি দেৱদাস সেই বৰষুণৰ নিশা তোমাৰ পদূলিতেই মৰি গৈছিল। তোমাৰ সন্মুখত থিয় হৈ থকা এই মানুহজন কেৱল এজন সাধাৰণ মানুহ, যিয়ে নিজৰ পাপৰ প্ৰায়শ্চিত্ত কৰিব বিচাৰিছে আৰু এদিন নিজে ধ্বংস কৰা পৃথিৱীখন সজাবলৈ চেষ্টা কৰিছে।"
ঠিক সেই সময়তে চন্দ্ৰমুখী সোমাই আহে। তাইক দেখি পাৰোৱে যোৱা পাঁচ বছৰৰ সকলো নোকোৱা সত্য বুজি উঠে। পাৰো চন্দ্ৰমুখীৰ ওচৰলৈ গৈ দুহাত জোৰ কৰি গভীৰ শ্ৰদ্ধাৰে কয়, "তুমি মোৰ দেৱক নতুন জীৱন দিলা। তোমাৰ এই ঋণ মই সাত জন্মতো পৰিশোধ কৰিব নোৱাৰিম।"
দেৱদাস ২-ৰ অন্ত কোনো কৰুণ ট্ৰেজেডীৰে নহয়। পাৰোৱে হাভেলীৰ সেই নিসংগতাৰ মাজলৈ উভতি যাবলৈ অস্বীকাৰ কৰে। তাই নিজৰ সকলো সম্পত্তি আৰু দায়িত্ব মাহিনায়েকৰ সন্তানসকলক অৰ্পণ কৰি শিৱপুৰতে থাকি যোৱাৰ সিদ্ধান্ত লয়। দেৱ, পাৰো আৰু চন্দ্ৰমুখী— তিনিওজনে মিলি গাঁওখনত এখন বিশাল চিকিৎসালয় আৰু এখন উপযুক্ত বিদ্যালয় নিৰ্মাণ কৰে। সমাজে তেওঁলোকৰ পিঠিৰ পিছত কি ফুচফুচায়, তালৈ তেওঁলোকে আৰু ভ্ৰূক্ষেপ নকৰে। দেৱদাসে অৱশেষত নিজৰ শান্তি বিচাৰি পালে, পাৰোৱে পালে নিজৰ জীৱন, আৰু চন্দ্ৰমুখীয়ে পালে নিজৰ পৰিয়াল। ই এনে এক কিম্বদন্তি কাহিনীত পৰিণত হয় য'ত প্ৰেমে কাকো ধ্বংস নকৰে, বৰঞ্চ পৃথিৱীখনক সুস্থ আৰু সুন্দৰ কৰি তোলাৰ চূড়ান্ত শক্তিত পৰিণত হয়।



 লিখক : অপূৰ্ব দাস।



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