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डियर ज़िंदगी (2016) – फिल्म की पूरी कहानी
By Good Assam
“डियर ज़िंदगी” एक ऐसी फिल्म है जो बाहर से बहुत साधारण लगती है, लेकिन अंदर से भावनाओं, रिश्तों और आत्म-खोज की गहराई से भरी हुई है। यह कहानी है एक ऐसी लड़की की, जो बाहर से सफल और आत्मनिर्भर दिखती है, लेकिन अंदर से टूटी हुई है।
फिल्म की मुख्य किरदार है कायरा (आलिया भट्ट), जो एक महत्वाकांक्षी और टैलेंटेड सिनेमैटोग्राफर है। वह मुंबई में रहती है और अपने करियर में कुछ बड़ा करना चाहती है। उसकी ख्वाहिश है कि वह एक ऐसी फिल्म बनाए जो उसके दिल के करीब हो। बाहर से देखने पर उसकी जिंदगी ग्लैमरस और आज़ाद लगती है — अच्छे दोस्त, बॉयफ्रेंड, काम और एक मॉडर्न लाइफस्टाइल। लेकिन असलियत में वह अंदर से बहुत अकेली और असुरक्षित महसूस करती है।
कायरा का बॉयफ्रेंड रघुवेंद्र (कुणाल कपूर) है, जो एक फिल्ममेकर है। वह उसके साथ काम करती है और दोनों के बीच प्यार भी है। लेकिन जब रघुवेंद्र अपनी शादी की बात करता है और किसी दूसरी लड़की से सगाई कर लेता है, तो कायरा का दिल टूट जाता है। वह खुद को धोखा खाया हुआ महसूस करती है। उसके लिए रिश्ते हमेशा अधूरे और अस्थिर रहे हैं।
इसके बाद कायरा की जिंदगी में एक और शख्स आता है — सिड (अंगद बेदी)। वह एक अच्छे परिवार से है और कायरा को पसंद करता है। लेकिन जब रिश्ता थोड़ा गंभीर होने लगता है, तो कायरा घबरा जाती है। उसे कमिटमेंट से डर लगता है। वह हर बार किसी के करीब आती है और फिर खुद ही दूर चली जाती है।
इन सबके बीच कायरा को अपने बचपन की यादें परेशान करने लगती हैं। उसे अनिद्रा (नींद न आना) की समस्या हो जाती है। वह रातों को सो नहीं पाती और अंदर ही अंदर बेचैन रहती है। करियर में भी उसे झटके लगते हैं। उसकी फिल्म प्रोजेक्ट उससे छिन जाता है और वह खुद को असफल महसूस करने लगती है।
हताश होकर वह मुंबई छोड़कर अपने माता-पिता के पास गोवा चली जाती है। लेकिन वहां भी उसका अपने माता-पिता के साथ रिश्ता सहज नहीं है। बचपन में उसे अपने नाना-नानी के पास छोड़ दिया गया था, जिससे उसके मन में एक गहरी चोट रह गई है। उसे लगता है कि उसके माता-पिता ने उसे त्याग दिया था। यही भावना उसके हर रिश्ते में असुरक्षा और डर बनकर उभरती है।
गोवा में ही उसकी मुलाकात होती है डॉ. जहांगीर खान (शाहरुख खान) से, जो एक मनोचिकित्सक (थैरेपिस्ट) हैं। लोग उन्हें प्यार से “जग” कहते हैं। शुरू में कायरा को थेरेपी का विचार अजीब लगता है। उसे लगता है कि वह पागल नहीं है, फिर उसे डॉक्टर के पास क्यों जाना चाहिए? लेकिन धीरे-धीरे वह डॉ. जग से मिलना शुरू करती है।
डॉ. जग का तरीका बहुत अलग है। वह गंभीर और औपचारिक नहीं हैं, बल्कि दोस्त की तरह बात करते हैं। वह कायरा को सिखाते हैं कि जिंदगी को समझने के लिए खुद को समझना जरूरी है। एक दिन वह कायरा से कहते हैं,
“हम अपने लिए सही कुर्सी चुनने में इतना वक्त लगा देते हैं, तो जिंदगी के लिए सही पार्टनर चुनने में जल्दबाजी क्यों?”
थेरेपी के दौरान कायरा अपने दिल के जख्मों को पहचानने लगती है। उसे एहसास होता है कि उसके माता-पिता के फैसले गलत नहीं थे, बल्कि परिस्थितियों के कारण थे। लेकिन बचपन में जो अकेलापन उसने महसूस किया, उसने उसके मन में गहरी असुरक्षा पैदा कर दी। उसे हमेशा डर रहता है कि जिसे वह प्यार करेगी, वह उसे छोड़ देगा।
डॉ. जग उसे सिखाते हैं कि हर रिश्ता परफेक्ट नहीं होता, और हर इंसान में कुछ कमियां होती हैं। लेकिन हमें अपने डर से भागने के बजाय उनका सामना करना चाहिए। वह कहते हैं कि जिंदगी में खुश रहने के लिए खुद से प्यार करना सबसे जरूरी है।
धीरे-धीरे कायरा अपने माता-पिता से बात करती है। वह अपने दिल की बात कहती है — कि बचपन में उसे कितना अकेलापन महसूस हुआ था। उसके माता-पिता भी अपनी मजबूरियों के बारे में बताते हैं। यह बातचीत आसान नहीं होती, लेकिन इससे उनके रिश्ते में एक नई शुरुआत होती है।
कायरा अपने पुराने बॉयफ्रेंड्स के बारे में भी सोचती है। उसे एहसास होता है कि हर बार वह खुद ही रिश्तों से भागती रही है। वह किसी को मौका ही नहीं देती थी कि वह उसके करीब आ सके।
थेरेपी के बाद कायरा के अंदर एक बदलाव आता है। वह खुद को स्वीकार करना सीखती है — अपनी कमियों के साथ। वह समझती है कि जिंदगी में दर्द भी होगा, असफलताएं भी होंगी, लेकिन उनसे भागने के बजाय उन्हें अपनाना चाहिए।
फिल्म के अंत में कायरा फिर से अपने करियर पर ध्यान देती है। वह एक नई फिल्म की शूटिंग शुरू करती है। इस बार वह ज्यादा आत्मविश्वासी और शांत है। सिड फिर से उसकी जिंदगी में आता है, लेकिन इस बार कायरा बिना डर के उसे मौका देती है।
“डियर ज़िंदगी” सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि खुद से प्यार करने की कहानी है। यह फिल्म बताती है कि मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही जरूरी है जितना शारीरिक स्वास्थ्य। थेरेपी लेना कमजोरी नहीं, बल्कि हिम्मत की बात है।
फिल्म का सबसे खूबसूरत संदेश यही है कि जिंदगी परफेक्ट नहीं होती, लेकिन हम उसे बेहतर बना सकते हैं — अगर हम अपने डर, अपने दर्द और अपने अतीत को समझ लें।
कायरा की यात्रा हमें सिखाती है कि कभी-कभी हमें अपने दिल के टूटे हुए टुकड़ों को जोड़ने के लिए किसी “जग” की जरूरत होती है — जो हमें आईना दिखाए और कहे,
“डरो मत, जिंदगी से प्यार करो… क्योंकि जिंदगी भी तुमसे प्यार करती है।”
यही इस फिल्म की असली आत्मा है — खुद को अपनाना, अपने जख्मों को समझना और फिर एक नई शुरुआत करना।