आज उरुका (Uruka) है — और यह दिन असमिया लोगों के लिए साल का सबसे खास दिन हैं
( अनुराधा दास )
आज उरुका (Uruka) है — और यह दिन असमिया लोगों के लिए साल का सबसे खास,आनंदमय और स्वाद से भरा दिन माना जाता है। उरुका, माघ बिहू (भोगाली बिहू) की पूर्व संध्या होती है, जो फसल कटाई के बाद मनाया जाने वाला सबसे बड़ा त्योहार है। यह दिन सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि सामूहिकता, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और खुशहाली का प्रतीक है।
◽उरुका का अर्थ और महत्व
‘उरुका’ शब्द का अर्थ है रात भर जागना और उत्सव मनाना। यह वह रात होती है जब असमिया लोग परिवार, मित्रों और पूरे गाँव के साथ मिलकर खाना बनाते हैं, खाते हैं और खुशियाँ साझा करते हैं। माना जाता है कि उरुका की रात जितनी आनंदमय होती है, आने वाला वर्ष उतना ही समृद्ध होता है।
यह त्योहार मुख्य रूप से किसानों से जुड़ा है। पूरे वर्ष खेतों में मेहनत करने के बाद, फसल घर आने की खुशी में यह उत्सव मनाया जाता है।
◽आज उरुका के दिन असमिया लोगों के लिए क्या खास है?
1. सामूहिक भोज (Community Feast)
उरुका की सबसे बड़ी खासियत है सामूहिक भोजन। गाँवों में लोग बांस, लकड़ी और पत्तों से अस्थायी झोपड़ी (भेलाघर) बनाते हैं। इसी भेलाघर में सब मिलकर रात का खाना पकाते और खाते हैं।
यह भोजन सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि एकता और भाईचारे का प्रतीक होता है।
2. उरुका का खास खाना
आज के दिन असमिया घरों में और भेलाघरों में कई पारंपरिक व्यंजन बनते हैं, जैसे:
• मांस और मछली के व्यंजन
• भात (चावल)
• पिठा – तिल पिठा, नारियल पिठा
• लड्डू – तिल और गुड़ से बने लारू
• चावल की बीयर (साज या लाओपानी)
यह माना जाता है कि उरुका के दिन खूब खाओ, क्योंकि अगले दिन माघ बिहू की सुबह साधारण और सात्त्विक भोजन किया जाता है।
3. आग, अलाव और भेलाघर
उरुका की रात को आग जलाना बहुत शुभ माना जाता है। अलाव के चारों ओर बैठकर लोग बातें करते हैं, गीत गाते हैं और हँसी-मज़ाक करते हैं। यह आग ठंड से बचाव के साथ-साथ नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने का प्रतीक भी मानी जाती है।
खासकर असम में उरुका के बाद जब सुबह हो जाते हैं तब नहाने के बाद अच्छे कपड़े पहनते हैं और उसके बाद मेजि जलाते हैं। अग्नि देव को प्रणाम करके पिठा- लड्डू दान करते हैं और प्रार्थना करते हैं की आने वाले साल अच्छा हो। इस दिन को दोमाही कहा जाता है।
4. गीत, मस्ती और परंपरा
आज की रात सिर्फ खाने तक सीमित नहीं होती। असमिया लोकगीत, ढोल, पेपा और पारंपरिक धुनों के साथ लोग नाचते-गाते हैं। बच्चे, युवा और बुज़ुर्ग — सभी इस रात में बराबर के सहभागी होते हैं।
5. नई फसल के लिए धन्यवाद
उरुका दरअसल प्रकृति और ईश्वर को धन्यवाद कहने का दिन है। लोग अच्छी फसल के लिए आभार व्यक्त करते हैं और आने वाले साल में और अधिक समृद्धि की कामना करते हैं।
◽उरुका के बाद क्या होता है?
उरुका के अगले दिन माघ बिहू मनाया जाता है। सुबह-सुबह लोग स्नान कर मेज़ी (अग्निकुंड) जलाते हैं और उसमें तिल, पिठा और चावल अर्पित करते हैं। यह अग्नि देवता को धन्यवाद देने और पुराने दुःखों को जलाकर नई शुरुआत का संकेत होता है।
◽आधुनिक समय में उरुका
आज भले ही लोग शहरों में रहने लगे हों, लेकिन उरुका की भावना अब भी जीवित है। परिवार एक साथ भोजन करते हैं, पुराने दोस्तों से मिलते हैं और सोशल मीडिया के ज़रिए भी शुभकामनाएँ साझा करते हैं। परंपरा बदली नहीं है, बस उसका रूप थोड़ा आधुनिक हो गया है।
आज उरुका है, और असमिया लोगों के लिए यह दिन खुशी, स्वाद, परंपरा और एकता का पर्व है। यह त्योहार सिखाता है कि जीवन की असली खुशी साथ बैठकर खाने, हँसने और साझा करने में है। उरुका की हार्दिक शुभकामनाएँ!