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शनिदेव और उनकी पत्नी धामिनी (मंदा) का श्राप: क्यों मानी जाती है शनिदेव की दृष्टि अशुभ?



शनिदेव और उनकी पत्नी धामिनी (मंदा) का श्राप: क्यों मानी जाती है शनिदेव की दृष्टि अशुभ? 


( Anuradha Das )


हिंदू धर्म और पुराणों में शनिदेव को न्याय, कर्म और दंड के देवता के रूप में जाना जाता है। वे व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं—अच्छे कर्मों पर पुरस्कार और बुरे कर्मों पर दंड। लेकिन शनिदेव से जुड़ी एक ऐसी कथा है, जिसने उनकी दृष्टि को अत्यंत प्रभावशाली और कई बार भयकारी बना दिया। यह कथा है उनकी पत्नी धामिनी (मंदा) द्वारा दिए गए श्राप की, जिसने शनिदेव के स्वभाव और पूजन-पद्धति को हमेशा के लिए अलग बना दिया।






🔴 शनिदेव का विवाह और उनकी भक्ति


पौराणिक कथाओं के अनुसार, शनिदेव का विवाह गंधर्वराज चित्ररथ की पुत्री धामिनी से हुआ था, जिन्हें मंदा भी कहा जाता है। धामिनी अत्यंत रूपवती, तेजस्वी और पतिव्रता स्त्री थीं। विवाह के बाद उन्होंने पूर्ण निष्ठा से अपने पति धर्म का पालन किया।

शनिदेव बचपन से ही महादेव के अनन्य भक्त थे। उनका मन सांसारिक विषयों से अधिक ईश्वर भक्ति, ध्यान और तप में लीन रहता था। विवाह के पश्चात भी शनिदेव का अधिकांश समय शिव शंकर के ध्यान और भक्ति में ही व्यतीत होता था। वे सांसारिक सुखों से विरक्त थे और ईश्वर साधना को ही जीवन का परम लक्ष्य मानते थे।






🔴 पत्नी की उपेक्षा और ऋतु स्नान की रात


एक रात की घटना ने इस कथा को जन्म दिया। धामिनी ऋतु स्नान के बाद पुत्र प्राप्ति की पवित्र इच्छा लेकर अपने पति शनिदेव के पास पहुँचीं। हिंदू धर्म में यह समय संतान प्राप्ति के लिए शुभ माना जाता है। धामिनी ने शनिदेव को पुकारा, उनसे निवेदन किया कि वे ध्यान त्यागकर अपने दांपत्य कर्तव्य का पालन करें।

लेकिन उस समय शनिदेव गहरे ध्यान में लीन थे। वे इतने तल्लीन थे कि न तो उन्होंने पत्नी की पुकार सुनी और न ही उनकी ओर दृष्टि डाली। बार-बार पुकारने पर भी जब शनिदेव का ध्यान नहीं टूटा, तो धामिनी को गहरा आघात पहुँचा।







🔴 क्रोध और श्राप


पत्नी के रूप में उपेक्षा और अपमान की पीड़ा से धामिनी अत्यंत क्रोधित हो उठीं। क्रोध में आकर उन्होंने शनिदेव को कठोर श्राप दे दिया—


🔴 “आज के बाद तुम्हारा जो मुख दर्शन करेगा और तुम जिस किसी पर भी अपनी दृष्टि डालोगे, वह नष्ट हो जाएगा।”


यह श्राप अत्यंत प्रभावशाली था, क्योंकि धामिनी स्वयं पतिव्रता और पुण्यात्मा थीं। उनके मुख से निकला वचन निष्फल नहीं हो सकता था।


🔴 पश्चाताप और विवशता


जब शनिदेव का ध्यान टूटा, तो उन्होंने अपनी पत्नी को क्रोधित अवस्था में देखा और पूरी घटना को समझा। उन्हें अपनी भूल का गहरा पश्चाताप हुआ। उन्होंने धामिनी से क्षमा याचना की और कहा कि वे भक्ति में इतने लीन थे कि अपने दांपत्य कर्तव्य को भूल गए।

धामिनी को भी अपने दिए गए श्राप पर पश्चाताप हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पतिव्रता स्त्री का दिया हुआ श्राप वापस नहीं लिया जा सकता था। यह श्राप शनिदेव के जीवन का स्थायी सत्य बन गया।


🔴 श्राप का प्रभाव: झुकी हुई दृष्टि


इस श्राप के कारण शनिदेव सदैव सिर झुकाकर चलने लगे, ताकि उनकी दृष्टि से किसी निर्दोष को हानि न पहुँचे। यही कारण है कि पुराणों में शनिदेव को अक्सर नीचे की ओर देखते हुए दर्शाया गया है।


इसी श्राप के प्रभाव से शनिदेव की दृष्टि को क्रूर, कठोर और विनाशकारी माना गया। लेकिन यह भी सत्य है कि शनिदेव बिना कारण किसी को दंड नहीं देते। वे केवल उन्हीं पर अपनी दृष्टि डालते हैं, जो अपने कर्मों से दंड के पात्र बनते हैं।


🔴 शनिदेव की मूर्ति और दर्शन को लेकर मान्यता


• इसी के कारण शनिदेव की मूर्ति या तस्वीर का सीधे दर्शन नहीं करना चाहिए।


• मंदिरों में उनकी सजीव मूर्ति या चित्र रखना उचित नहीं माना गया।


• शनिदेव की पूजा काले पत्थर या चिपकली के समान शिला रूप में की जानी चाहिए।


• कई स्थानों पर शनिदेव का प्रतीकात्मक स्वरूप—काले पत्थर या शिला—ही पूजा जाता है, जिससे उनकी सीधी दृष्टि से बचा जा सके।


🔴 सोशल मीडिया पर तस्वीरें और विवाद


आज के समय में लोग सोशल मीडिया जैसे Facebook, Instagram आदि पर शनिदेव की तस्वीरें साझा कर भक्ति प्रकट करते हैं। लेकिन इस पौराणिक कथा के अनुसार, शनिदेव के सभी चित्रों और मूर्तियों को देखना शुभ नहीं माना गया है। पत्नी के श्राप के कारण उनकी दृष्टि को अत्यंत प्रभावशाली और हानिकारक माना गया है।


इसी कारण शनिदेव की भक्ति नाम, मंत्र, दान और कर्म के माध्यम से करनी चाहिए, न कि चित्रों और मूर्तियों के सीधे दर्शन द्वारा।



शनिदेव की कथा हमें यह सिखाती है कि भक्ति चाहे कितनी ही महान क्यों न हो, सांसारिक कर्तव्यों की उपेक्षा उचित नहीं है। साथ ही यह भी संदेश देती है कि क्रोध में लिया गया निर्णय कितना बड़ा परिणाम ला सकता है।


शनिदेव न तो केवल भय के देवता हैं और न ही केवल अशुभ। वे न्याय के प्रतीक हैं। यदि व्यक्ति अपने कर्म शुद्ध रखे, सत्य और धर्म के मार्ग पर चले, तो शनिदेव की कृपा सबसे अधिक फलदायी होती है।





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