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বিজ্ঞাপন

तेजपुर विश्वविद्यालय की बड़ी वैज्ञानिक सफलता: रक्त जांच से पित्ताशय के कैंसर की प्रारंभिक पहचान की नई उम्मीद



तेजपुर विश्वविद्यालय की बड़ी वैज्ञानिक सफलता: रक्त जांच से पित्ताशय के कैंसर की प्रारंभिक पहचान की नई उम्मीद


( Anuradha Das )

तेजपुर विश्वविद्यालय के आणविक जीवविज्ञान एवं जैव-प्रौद्योगिकी विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. पंकज बोरा और शोधकर्ता डॉ. चिन्मयी बरुआ के नेतृत्व में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला वैज्ञानिक शोध सफलतापूर्वक संपन्न हुआ है। इस शोध में वैज्ञानिकों ने मानव रक्त में मौजूद कुछ विशिष्ट रासायनिक तत्वों, जिन्हें मेटाबोलाइट्स कहा जाता है, की पहचान की है। इन मेटाबोलाइट्स की सहायता से पित्ताशय (गॉलब्लैडर) के कैंसर का समय रहते, सरल तरीके से और अपेक्षाकृत कम लागत में पता लगाया जा सकता है।



शोधकर्ताओं का कहना है कि यह खोज पित्ताशय के कैंसर की जांच और उपचार की दिशा में एक बड़ा बदलाव ला सकती है। अब तक इस कैंसर की पहचान अधिकतर तब होती थी, जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती थी। लेकिन इस नई तकनीक के माध्यम से शुरुआती अवस्था में ही कैंसर की पहचान संभव हो सकेगी, जिससे समय पर उपचार शुरू किया जा सकेगा और रोगी के जीवन की रक्षा की संभावना कहीं अधिक बढ़ जाएगी।

इस शोध की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके जरिए पित्ताशय की पथरी से जुड़े कैंसर और बिना पथरी वाले कैंसर के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सकता है। यह इसलिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि असम और उत्तर-पूर्व भारत में पित्ताशय के कैंसर का स्वरूप दुनिया के अन्य हिस्सों से काफी अलग पाया गया है। यहां बड़ी संख्या में ऐसे मरीज सामने आते हैं, जिनमें पथरी नहीं होती, फिर भी वे इस घातक बीमारी से पीड़ित होते हैं।

चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, पित्ताशय का कैंसर एक अत्यंत खतरनाक और “साइलेंट” बीमारी है। यह लंबे समय तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के शरीर में पनपता रहता है। रोगी को जब तक किसी गंभीर परेशानी का अहसास होता है, तब तक कैंसर आमतौर पर उन्नत अवस्था में पहुंच चुका होता है। यही कारण है कि इस कैंसर में मृत्यु दर काफी अधिक मानी जाती है।

असम सहित पूरे उत्तर-पूर्व भारत में पित्ताशय का कैंसर आज एक गंभीर जनस्वास्थ्य समस्या के रूप में उभर चुका है। वैश्विक आंकड़ों के अनुसार, पित्ताशय के कैंसर के मामलों में चिली और बोलीविया के बाद भारत का स्थान आता है। वहीं भारत के भीतर, असम में इस बीमारी की दर सबसे अधिक दर्ज की गई है। यह स्थिति राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था और वैज्ञानिक समुदाय दोनों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।

आमतौर पर दुनिया भर में पित्ताशय की पथरी को इस कैंसर का सबसे बड़ा जोखिम कारक माना जाता है। लंबे समय तक पथरी की मौजूदगी पित्ताशय की दीवारों में सूजन और कोशिकीय परिवर्तन का कारण बन सकती है, जो आगे चलकर कैंसर का रूप ले लेती है। लेकिन असम के संदर्भ में स्थिति बिल्कुल अलग है। यहां लगभग 70 प्रतिशत से अधिक मरीज ऐसे पाए गए हैं, जिन्हें पित्ताशय की पथरी नहीं होती, फिर भी वे इस कैंसर से ग्रस्त हो जाते हैं। यह तथ्य वैज्ञानिकों के लिए लंबे समय से एक रहस्य बना हुआ था।

यही कारण है कि तेजपुर विश्वविद्यालय के इस शोध को विशेष महत्व दिया जा रहा है। रक्त में मौजूद मेटाबोलाइट्स के पैटर्न के आधार पर यह समझा जा सकता है कि कैंसर पथरी से जुड़ा है या बिना पथरी के विकसित हुआ है। इससे न केवल बीमारी की पहचान आसान होगी, बल्कि भविष्य में इसके कारणों को समझने और लक्षित उपचार विकसित करने में भी मदद मिलेगी।

दुनिया के कई हिस्सों में जहां पित्ताशय का कैंसर अपेक्षाकृत दुर्लभ माना जाता है, वहीं असम और उत्तर-पूर्व भारत में यह तीसरा सबसे अधिक पाया जाने वाला कैंसर बन चुका है। यहां यह बीमारी विशेष रूप से आक्रामक पाई गई है और तेजी से फैलने की प्रवृत्ति रखती है। इसके पीछे पर्यावरणीय कारण, खान-पान की आदतें, जल प्रदूषण, आनुवंशिक कारक और जीवनशैली जैसे कई संभावित कारण माने जा रहे हैं, जिन पर अभी और शोध की आवश्यकता है।

पित्ताशय का कैंसर आमतौर पर बिना किसी विशेष लक्षण के शुरू होता है। शुरुआती चरण में कभी-कभी हल्का पेट दर्द, अपच, मितली या कमजोरी जैसी सामान्य समस्याएं दिखाई दे सकती हैं, जिन्हें लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। जब बीमारी आगे बढ़ती है, तब पीलिया, तेज दर्द, वजन तेजी से कम होना और भूख न लगना जैसे गंभीर लक्षण सामने आते हैं।

दुर्भाग्यवश, अधिकतर मामलों में रोगी तब डॉक्टर के पास पहुंचता है, जब वह किसी अन्य समस्या, जैसे पित्ताशय की पथरी या जॉन्डिस के इलाज के लिए जाता है। जांच के दौरान ही कैंसर की मौजूदगी का पता चलता है। उस समय तक अक्सर कैंसर इतना फैल चुका होता है कि शल्य चिकित्सा द्वारा पित्ताशय को पूरी तरह निकालना अत्यंत कठिन या असंभव हो जाता है।

ऐसी स्थिति में डॉक्टरों के पास उपचार के सीमित विकल्प ही बचते हैं। कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी की मदद से कुछ समय तक बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन इस अत्यंत आक्रामक कैंसर को पूरी तरह समाप्त कर पाना आज भी चिकित्सा विज्ञान के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

इसी पृष्ठभूमि में तेजपुर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की यह खोज आशा की एक नई किरण के रूप में देखी जा रही है। यदि रक्त जांच के माध्यम से पित्ताशय के कैंसर की पहचान प्रारंभिक अवस्था में हो जाती है, तो शल्य चिकित्सा और अन्य उपचार अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं। इससे न केवल रोगियों की जीवन अवधि बढ़ेगी, बल्कि उनकी जीवन गुणवत्ता में भी सुधार होगा।

यह शोध असम और उत्तर-पूर्व भारत के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश और विश्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भविष्य में यदि इस तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाया जाता है और इसे नियमित स्वास्थ्य जांच का हिस्सा बनाया जाता है, तो पित्ताशय के कैंसर से होने वाली मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में यह खोज एक मील का पत्थर साबित हो सकती है।







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